Tuesday, 9 September 2014

" वो ...अढ़ाई आखर "

वो अढाई आखर ..जीवन 
वो अढाई आखर ...मौत 
वो अढ़ाई आखर ...तुम 
और मैं ...
लिए वो अढ़ाई आखर 
जब पहुंचे कहीं 
गीत गूंज उठा वहीँ 
नृत्यांगना बनी आत्मा 
घुंघरू में स्वर गुंथे 
वो अढ़ाई आखर ..बन गया "हम "
सरगम बजती है
रागनी सजती है
लज्जा संवरती है
चुप्पी ..निखरती है
उतरा अंगना में वो ...अढ़ाई आखर
लगा सपना सा वो ...अढ़ाई आखर
रचने लगा वो ......अढ़ाई आखर
रंगने लगा वो .. ...अढ़ाई आखर
बीज बन गया वो ..अढ़ाई आखर
सींच गया वो ........अढ़ाई आखर
वृक्ष बना जब वो ....अढ़ाई आखर
पुष्पित हो महक गया वो ......अढ़ाई आखर
तुमने कहा नहीं मैने सुना नहीं वो ..अढ़ाई आखर
फिर भी गुणा गया वो .....अढ़ाई आखर
पीर पिघला गया वो .....अढ़ाई आखर ---------- विजयलक्ष्मी

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