Wednesday, 17 September 2014

" मुझे रोटी बनना ही भाता है"

" आकर्षण और विकर्षण 
दो दिखे क्या ..मुझे तो नहीं दिखे 
एक ही सिक्के के दो पहलू 
भूखे को रोटी आकर्षित करती है और भरे पेट को विकर्षित 
इसीलिए रसोई में हर दिन नया पकवान बनता है 
लेकिन रोटी से ......कभी मन भरेगा क्या
सोचकर बताना ..
कोई तरकारी हो ..
भूख कम या भारी हो
छोले राजमा या दालमखनी
हलवा पूरी या हो चटनी
आचार से भी मन ऊब सकता है
चाट पकौड़ी को मना किया जा सकता है
लेकिन ..अटकता है रोटी का स्वाद ही
याद रोटी ही आती है सबकुछ मिल जाने के बाद भी
रूप तो मृगतृष्णा ठहरा
सौन्दर्य चेहरों में हुआ करता तो लैला को कोई न जानता
जैसे धरती पर सहरा
कितनी भी बुझाओ प्यास बुझती कब है भला
और मुझे रोटी बनना ही भाता है
" -- विजयलक्ष्मी

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