Monday, 8 September 2014

" कोई बतायेगा हिंदुस्तान का कश्मीर बहा या....?"



काश्मीर बह रहा है ,
कोई बतायेगा हिंदुस्तान का कश्मीर बहा 
या पकिस्तान का 
या अलगाववादियों का बह गया सारा 
या अभी कश्मीरियत बकाया है लहू में जिनके उनके घर बहे 
या अभी कोई बकाया है बहने को निशाँ किसी और कौम का 
हिन्दू बहेंगे कैसे पहले ही भगा दिए थे मारकर 
मुस्लिम तो अल्लाह के बंदे हैं ..उनपर अल्लाह का कहर होता नहीं है 
इंसानियत तो बहुत पहले जज्ब हो चुकी इंसानी शक्ल के भेडियो में 
हाँ ..ये सच है ..अधुरा नहीं पूरा सच .."काश्मीर बह रहा है "
रिस रहा है दर्द जिसमे ..वो किसका मकान है
गिर रही है जिसकी छत वो किसकी दूकान है
कौन है जो बेवा हो रही है
कौन है जो जिन्दगी को रो रही है
वो कहाँ गये जो तोड़ते फिर रहे थे देश को
उन्हें मौत ने निगला या नहीं टुकड़े टुकड़े कर रहे थे ख्वाब को
वो जिन्दा है या दफन हो गये कब्र में जो बेच रहे थे देश को
कोई आता क्यूँ नहीं अता करने फर्ज अपने
कोई बोलता क्यूँ जिनके बह रहे है खुद के अपने
ये दर्द भारत का भारत रिस रहा है
ये ख्वाब भारत की आँख का है जो टंगा है मुहाने पर आँख के
कहदो दुश्मनों से ..नजर भर देखना भी छोड़ दे
झूठे सच्चे ख्वाब अपनी आँखों के तोड़ दे
काश्मीर हमारा है ..कोई नहीं रिसा ..हमारे सिवा
पाकिस्तानी झंडा फहराने वाले फना हो गये दर्द के खर्च को देखकर
बाकि सब भी गारद हो गये दौलत की जरूरत देखकर
हमे आता है अपने की जिन्दा रखना
भूखे भाई को रोटी खिलाकर खुद खाना
कौन बतायेगा किसका काश्मीर बहा
सुनो टेलीविजन पर गला फाड़ फाड़ कर पुकार रहा है भारत का कश्मीर बाढ़ से त्रस्त है
ये दर्द हमारा है हमारे घर का है
काश्मीर बह रहा है ,
कोई बतायेगा हिंदुस्तान का कश्मीर बहा
या पकिस्तान का
या अलगाववादियों का बह गया सारा ---- विजयलक्ष्मी

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