Saturday, 20 September 2014

" छिपाकर रखता है मुझको मुझसे "

" कत्ल भी करता है खुद को कातिल मानता भी नहीं ,
बहता है लहू संग मुझमे औ मुझे पहचानता भी नहीं 

अजब हैरान हूँ उस शनासाई से खुदारा माजरा क्या है 
कहता है जालिम औ गुनहगार मुझे खुद मानता भी नहीं 

कहता है रुको मुझसे ,न हो धडकन ही रुक जाये मेरी 
उफ़ कयामत भी बुलाई खुद, बात मगर मानता भी नहीं

चाँद सा चमकना रास नहीं बाजार लगाकर खरीदता है
छिपाकर रखता है मुझको मुझसे मगर मानता भी नहीं

बताता है जहरीला जहर पसंद क्यूँ ,जुदा भी नहीं करता
है बहता दरिया, मुझे खुद में बसाया मगर मानता ही नहीं
"
-- विजयलक्ष्मी

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