Friday, 6 September 2024

जीना है स्वाभिमान के साथ

 क्षमा याचना करनी अरु क्षमा दान दोनों ही बंद करो 

जीना है स्वाभिमान के साथ, देशद्रोहियों से युद्ध करो 


जीवन जीने की इच्छाशक्ति यदि स्वाभिमान पर भारी है 

समझ लीजिए, गुलामी की तरफ बढ़ने की तैयारी है ,


जाति-पाति में ब्याह शादियाँ अलग बात सामाजिक है 

जनगणना कर लड़ना आपस में पूर्णतया राजनीतिक है 


किसने बोला लड़ने भिड़ने को, किन्तु एक होकर रहो 

हालात देखिए बांग्लादेश के, सत्य उजागर सत्य कहो 


सत्य नग्न है किन्तु नगण्य नहीं हो सकता कभी भी 

मानवता जिंदा है तबतक, जिंदा सनातन यदि अभी 


वसुधैव कुटुम्बकम अपनी संस्कृति अपना संस्कार है 

औरों के व्यवहार में नफरत के संग मात्र प्रतिकार है 


यदि झूठ झुठला सकते हो, झुठला कर के दिखलाओ तो 

कहाँ नहीं तोड़फोड़ की, इतिहास के पाठ पढ़ाओ तो 


अहिंसा पर हिंसा भारी देखी, सबकी साहूकारी देखी 

झूठ मचलता देखा रेत में , गद्दारों की मक्कारी देखी 


कुटिल चाल देखी सत्ता की, जनता संग मारामारी देखी 

जयचंद भी देखे, शिवाजी, महाराणा की जयकारी देखी 


विदेशी कठपुतली, नाचते नेता,झूठी शान हजारी देखी 

टूटे देश सत्ता की खातिर, कैसी कैसी मक्कारी देखी ।


विजय लक्ष्मी जलज

Monday, 28 December 2020

नव वर्ष कैसे है अपना यार

न रीत ये अपनी न संस्कार 
इससेे इतर नहीं न स्वीकार
न धरणी ने अपना रंग बदला 
न किया अभी सोलह श्रृंगार 

फिर कैसे कहते हो बोलो 
यह नव वर्ष है अपना यार 

बर्फीली ठंडी हवा गहरी है 
पर्वत पर्वत बर्फ ठहरी है
सिकुड़ी हुई प्रकृति बैठी है 
शीत लहर से लगती ऐंठी है 
न वासन्ती रंग छाया अभी
न भ्रमर की गूंजी है गुंजार 

फिर कैसे कहते हो बोलो
यह नव वर्ष है अपना यार 

न रौनक चेहरों पर दिखती
 सर्दी की चादर है लिपटी 
उष्णता कोहरे में सिमटी 
धरती भी है लिपटी लिपटी 
माना दासता से गुजरे हैं किन्तु
भूलेंं क्यूँ हम अपने व्यवहार 

फिर कैसे कहते हो बोलो 
यह नव वर्ष है अपना यार 

हां,विश्वबन्धुत्व अपना भाव है 
माँँ भारती का भी यही प्रभाव है 
जब पकी फसल लहराएगी 
कुहासेे भरी रात गुजर जाएगी 
तब ये धरती भी हर्षाएगी 
कलियोंं पुष्पों से कर श्रृंगार 

अभी समय आया ही नहीं वह
फ़िर कैसा नव वर्ष है आया यार


बदलेगा मौसम होगा रूप सुहाना 
नव वर्ष का तब होगा त्यौहार 
सब बर्फ पिघल कर बह पायेगी 
होंगे प्रफुल्लित मन में संचरित राग 
फिर मौसम होगा खुशियों का 
चहुँँ और बिखरेगी मस्त बयार 

रूप रंग की नव बेला सा
ये धरती भी कर लेगी श्रृंगार

चटकेंगी कलियां महकेगी बगिया
मलय पवन की बहेगी बयार
रति रूप धर मुस्कान धरेगी
काम देव ज्यूं ले लेंगे अवतार
हर रंग खिलेगा धरती पर तब
और मीठे झरने से वार्तालाप 

पंछी की चहक सुरीली होगी
प्रकृति में मादकता अपार

मौसम खुद देगा गवाही तब 
झूमम झूम मनाओ नव-पर्व हजार
बाजार भरेंगे रौनक होगी भरपूर
जीवनन में मीठी होगी बयार 
चैत्र मास की प्रथमा वासर को
देवी-पूजन करते संग मंत्रोच्चार 
सच कहूं मन को तो भाता है 
एक इकलौता वही नव-वर्ष हमार 
✍️ विजय लक्ष्मी

Sunday, 7 June 2020

उजड गए हम अपने मकान से

उजड गए हम अपने मकान से उनकी मेहरबानी हुई ..
वो रोज बुलाते थे हमे आवाज देकर ,


हम न समझे उनकी रंजिशें ,बेदिली भी रास आने लगी 
चल दिए अब वो हमसे मुह फेरकर .


उन्हें क्या कहें अब दिल रोता भी नहीं रिसता भी नहीं 
देखता वो दर..जिसे गए वो भेड़ कर ,


मेरी मुहब्बत तमाशा ही हो गई अब तो, क्या छुपाऊँ
नाम न आयेगा, जुबां चली अहद लेकर.


छोड़ दिया मेरी गली आना और आवाज लगाना भी ..
थक गयी जिंदगी भी उन्हें आवाज देकर.


रोशन उजाले किसी और छत पे हों कोई गिला नहीं
मेरी मुडेर से सूरज चला रौशनी लेकर ,


सिमटने की जरूरत ही खत्म हुई अब उजड़ने दो हमे
मर भी न पायंगे हम, बदनामी देकर.


रोशन रहे दुनिया, दुआयें जो सुन सकें कही अनकही
नासूर हुए हम नामुराद चाहतें लेकर .
---विजयलक्ष्मी
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Wednesday, 1 January 2020

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,
कैसा खालीपन है बिन इन्कलाब के ?
मंजिलों की राह आसां नहीं होती 
क्यूँ सूनापन रोता है बिन सैलाब के ?
रिश्ता रूहानी बे-सबब खूब हुआ 
क्यूँकर सिमटी दुनिया बिन ख्वाब के ?
शून्य पसरा क्यूँ समन्दर के खारेपन सा
कमल खिलता कब है बिन तालाब के ?" 

------- विजयलक्ष्मी
.
जीना सीखने के बाद भी आहत आहट रुला जाती है ,,
जिन्दगी अहसास के फूल पलको पर खिला जाती है ।।   ---- विजयलक्ष्मी


इश्क औ गम का रिश्ता भला रिसता क्यूँ हैं ,,
मुस्कुराकर इश्क की चक्की में पिसता क्यूँ है ||    --- विजयलक्ष्मी































नम मौसम को बदलती है उमड़ते अहसास की गर्म चादर 
 ,,
जिसे ओढकर अक्सर मातम भी खुशियों का राग सुनाता है।।  ----   विजयलक्ष्मी




और मुस्काती हूँ बैठ ख्वाब के हिंडोले मैं ,,
रच बस मन भीतर पुष्पित रगों के झिन्गोले में | 
विजयलक्ष्मी

मुझे चस्का लग चुका

सर्द भोर का सूरज
तपिश तो देता है
छोड़ जाता है एक ठंडापन

ठिठुरता अहसास
धूप की ख्वाहिश
पतझड़ का रंग

सिकुड़ती त्वचा
नाराज होती प्यास
जुल्म करती साँझ

ऐसे में खिला पुष्प
जैसे कह रहा है
मेरी तरह महक

तन्हाई का क्या है
रंग ढंग जय न
कुछ यादों के संग

मुस्कुरा सफर तय कर
नहाकर नदिया में
मेरे संग लहरों में उतर

भूख तुडफुडा रही थी
नयन नम हैं ..
और तेरा अहसास जिन्दा

गगन के उस छोर
एक सितारा तन्हा इंतजार
टूटता रहता है दूजा इधर

आंसू गिरने से डरते हैं
तस्वीर न धुंधला जाये कहीं
और एक मुस्कान होठो पर

नश्तर भी मीठा था तुम्हारा
जुदाई कसैली सी लगती है
और याद कॉफ़ी मेरी तलब

मुझे चस्का लग चुका
मन को स्वाद भा गया
और दिल को तुम ||
---------- विजयलक्ष्मी

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,
कहानी है कलैंडर बदलाव की
जाम छलक गिरे गिरेबानों में
याद किसे है, मिले आजादी पर घाव की ।

बुरा वक्त था या गुलामी रच गयी लहू में
सच कहना दर्द रिश्ता रहा लम्हा लम्हा
खिलेगा गुल कोई किसी पल महका सा
या दोहराएगा फिर कहानी पुराने घाव सी |

फिर वही आग बिखरी है सडकों पर
फिर वही खंजर पैने होते दिखे मुझे
ख्वाब समझूं या हकीकत .. क्या कहूं
जख्म दुखा सौ गुना देख दुश्मन लश्कर लाव की |

जो छिडक रहा था नमक मेरा ही हाथ था
जिनकी आस्तीनों में छिपा नश्तर साथ था
मैं ढूंढता रहा अपनापन सीने में छिपा
जानता नहीं था उसको मेरी ही मौत की ताब थी |
 
---- विजयलक्ष्मी

Monday, 11 November 2019

" देव दीपावली "

त्रिपुरारी पूर्णिमा ...
शिव का त्रिपुरारी स्वरूप ..व .. देव दीपावली .. की बधाई ..
तारकासुर का वध शिव-पुत्र कार्तिकेय जी ने किया था .. उसी तारकासुर के तीन पुत्र थे ,, पिता की हत्या से दुखी उनके गुरु ने उन्हें ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करने के लिए कहा .. जिससे वह अमर होसके .. तब तीनो ने तप किया तथा ब्रह्मा जी से से वरदान माँगा जिसपर ब्रह्मा जी ने असमर्थता जताई तब उन्होंने बहुत अजीब सा वरदान माँगा जिसमे उन्होंने तीन नगरियाँ बसाने की बात कही ,, जिसमे बैठकर वह सभी लोको का भ्रमण कर सके तथा उनके एक सीध में एक आने पर एक ही तीर से तीनो की म्रत्यु जो देव कर सके उन्ही का हाथो म्रत्यु सम्भव होने का वरदान माँगा ,, ब्रह्मा जी ने उन्हें यह वरदान दे दिया ,... तब उन्होंने " मय " को तीन नगरी बनाने के लिए कहा गया ,
तारकासुर के बेटों ने क्रमशः
" तारकाक्ष की स्वर्ण पुरी ,,
कमलाक्ष ने चांदी की पुरी और
विद्युन्माली की लौह-पुरी बनाई गयी .तथा उन्हें वहां का राजा घोषित किया .. इस वरदान के कारण तीनो स्वयम को अजेय और अमर मान बैठे ..तीन पुर के राजा होकर ये त्रिपुरासुर कहलाये गये ..इनके उत्पात से देव मानव सब परेशान थे ..इन्होने देवताओ के साथ युद्ध कर बेदखल करके उनकी सम्पूर्ण सत्ता प्राप्त कर ली ,, देवताओं को घर से बेघर कर दिया तब सभी देव भगवान शिव की शरण में पंहुचे ,, शिव जी को प्रसन्न किया | देवो ने सम्पूर्ण व्यथा क्रमानुसार भगवान को सुनाई ..तत्पश्चात सहायता करने की बात कही ..प्रभु शंकर देवो की सहायतार्थ तैयार थे .... किन्तु दिव्य रथ की बात कही ..जिसके अनुसार सूर्य एवं चन्द्र को पहियों में लगना था ...इंद्र वरुण यम व् कुबेर को घोड़े के स्थान पर ..हिमालय धनुष हुए और शिव रूप स्वयम तीर बने ..अग्नि देव को तीर के अग्रिम नोक पर विराजित किया ...तब इस दिव्य रथारूढ़ शिव युद्ध के लिए उद्यत हुए ..तीनो भाई युद्ध के लिए ललक पड़े ... विनाशकाले विपरीत बुद्धि ... युद्ध रत हो भूल गये की तीनो एक सीध में आने पर मारे जा सकते हैं ... लम्बा युद्ध था अंतत: जैसे ही तीनो एक के पीछे एक हो पंक्तिबद्ध हुए शिव ने बाण छोड़ दिया ... ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार तीनो पुरियों समेत तीनो भाई भी धराशाही हुए ...देवों ने शिव स्तुति की तभी से शिव का एक नाम त्रिपुरारी पड़ गया ...
शिव की नगरी काशी में इसे दीपावली की तरह ही दीपों को प्रज्वलित किया जाता है ..|
त्रिपुरारी ..अर्थात तीन पुरियों के अरि ... शिव |
यह नाम कार्तिक पूर्णिमा केदिन ही पड़ा था शैव इसे बहुत मनोभाव से मनाते हैं |
अन्य पुराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु में मत्स्य अवतार धारण किया था था पृथ्वी की जीवन रक्षा की थी |
इसी दिन सिख सम्प्रदाय केप्रथम गुरु ..गुरु नानक देव जी का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है ... |
---- विजयलक्ष्मी

Tuesday, 15 October 2019

वो ताजा चाँद ...

मर्यादित 
आवश्यकता 
और ख़ुशी ..
हाँ ... मैंने ढूंढ ली है 
नमी में ख़ुशी 
पूनम की रात सी 
खिलती चांदनी सी ख़ुशी
तपती रेत की गर्मी में
महसूस की ख़ुशी
मन की भूख में ..
बरसात में ख़ुशी
जेठ की धूप में देखी ख़ुशी
सच कहूं ....
शायद ..मैंने
पढनी सीख ली है ख़ुशी
अभी लिखना बाकी है
मुझे पकडनी सीखनी होगी
एक दिन ..
पिजरे में रख लुंगी ख़ुशी
बिलकुल तुम्हारी तरह ..
किन्तु ...
मुझे साधनी होगी ख़ुशी
बिछड़ना तो न पड़ेगा
खुद से
किसी अर्थ हेतु .
शायद
तब कहीं ....
बहुत बिखरी पड़ी है 

चहुँ ऑर
आओ बैठकर मुस्कुराते हैं
कोई गीत गुनगुनाते हैं 

बसंत के आगमन का 
भरकर तमाम ख़ुशी 
वो ताजा चाँद ...
बिलकुल " तुम सा "

----  विजयलक्ष्मी

जी हाँ ...वही सैनिक हूँ


कोई बिखेरने की फ़िराक में 
कोई समेटने की ..
कोई लिपटने की फ़िराक में 
कोई लपेटने की ..
मैं ..भा रत ..भारत में रत हूँ 

राष्ट्र विदेह होकर ही सत हूँ
जी हाँ ..मैं प्रहरी ..मैं रक्षक हूँ
मैं ही भारत भाल पर नत हूँ
लुटाकर मिटाकर जो बढ़ता चला
छाती पर दुश्मन की चढ़ता चला
आन .मान , शान पर मरता चला
खुद को निसार करता चला
लहू से श्रृंगार करता चलता
प्रेम की खातिर जलता चला
राष्ट्रहित खुद से मुकरता चला
जी हाँ ...वही सैनिक हूँ
!!जयहिंद , जय भारत !
!
----- विजयलक्ष्मी

Friday, 26 July 2019

कारगिल विजय दिवस ...

करगिल विजय दिवस ...

गूंज उठी पहाड़ियां, चीख उठे पर्वत
बंदूक गोलियों का नर्तन हुआ जहाँ
देह से बेपरवाह अगम्य चोटियाँ थी 

वीरोचित कर्म बमवर्षण किया जहाँ
लहू का रंग पक्का ठहरा है आज भी
वन्देमातरम ही जिंदाबाद था जहां
दुर्लभ रणसमर समर्पित थी जिन्दगी
जयहिंद जयहिंद का गुजार था जहां
धरा कारगिल की तुम्हें कोटिश: नमन
लहूलुहान देह से तिरंगा लहराया वहाँ
शत शत नमन वीरों को जाँ लुटा गये
सर झुका है विजय बिगुल बजा जहां 

------- विजयलक्ष्मी

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तू बाल बच्चेदार है ....... हट जा पीछे ....... मैं जाऊंगा .
बात 1999 की है .....कारगिल में भीषण युद्ध चल रहा था ......माताओं के लाल तिरंगे में लिपट के घर आ रहे थे .... फिल्मों में जब हीरो गोलाबारी के बीच में हिरोइन को बचाने के लिए आगे बढ़ता है तो सब कुछ बड़ा रोमांटिक लगता है .........पर वहां जब LMG का burst आता है तो अच्छे अच्छों की पैंट खराब हो जाती है .......ऐसा मैंने बहुत से फौजियों के मुह से सुना है ......दीवाली पे जब बच्चे चिटपिटिया ,सुतली बम्ब और अनार जलाते हैं तो मां बाप को चिंता हो जाती है ......अरे ऊंचाई पर ...खड़ी चढ़ाई ......रात का समय ....गोलियों कि बौछार से बचने के लिए ये लोग एक चट्टान कि आड़ लिए हुए थे तभी Lieutenant Naveen के पास एक हथगोला फटा और उनकी एक टांग उड़ गयी .......उनकी चीख सुन कर सूबेदार रघुनाथ सिंह आगे बढे ...पर Capt. Vikram Batra ने रोक दिया .....रघुनाथ बोले सर मुझे जाने दीजिये ......नहीं तो वो मर जायेगा ...... उन्होंने जवाब दिया .......नहीं तू बाल बच्चे दार है ....हट जा पीछे ....मैं जाऊंगा ......फ़ौज में senior का हुक्म मानना ही पड़ता है .....चाहे कुछ भी हो जाए ......सो Capt Batra रेंगते हुए आगे बढे .....lieutenant नवीन के पास पहुचे ही थे कि उन्हें गोली लग गयी...सीने में ....... उन्हें किसी को goodbye कहने का भी मौका नहीं मिला .....
कारगिल युद्ध कि सालगिरह पर करगिल में एक कार्यक्रम में CAPT BATRA के जुड़वां हमशकल भाई VISHAL BATRA भी शामिल हुए ....वहां उन्हें सूबेदार मेजर रघुनाथ सिंह मिल गए......VISHAL BATRA बताते हैं कि रघुनाथ उन्हें देखते ही उनसे लिपट गए और फूट फूट कर रोने लगे ....उन्होंने बताया कि जीवन में आखिरी बार CAPT BATRA ने उनसे ही बात की थी .......तू बाल बच्चे दर है ....हट जा पीछे ....मैं जाऊंगा .......वो गए और फिर तिरंगे में ही लिपट कर वापस आये .......अपने गाँव पालमपुर में वो अक्सर कहा करते थे ........या तो तिरंगा लहरा के आऊंगा ....या तिरंगे में लिपट के आऊंगा .........पर आऊंगा ज़रूर .........
भारत सरकार ने उन्हें अदम्य साहस और शौर्य के लिए राष्ट्र के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया .....
जयहिंद !!! जयहिंद की सेना !!!

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लेकर तिरंगा सैनिको की टोलियाँ बढ़ी
माँ भारती के लाल लहूलुहान बोलियाँ चढ़ी
अदम्य साहस जान हथेली पर लिये
मौत का सामान लेकर आगे टोलियाँ चढ़ी
फड़कते बाजूओं की कसम खाते हुए

माँ भारती की आन मान शान जिंदगियाँ चढ़ी
है नमन वीरों को सभी कोटिश: प्रणाम
रणभूमि जिनके लिये आखिरी मुकाम बनी
खेत रहकर वो तो माँ का अभिमान हुए
कफन बाँध सर पर विजय पताका पहाडियाँ चढ़ी

----- विजय लक्ष्मी
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Thursday, 31 January 2019

और मुस्काती हूँ बैठ

और मुस्काती हूँ बैठ ख्वाब के हिंडोले मैं ,,
रच बस मन भीतर पुष्पित रगों के झिन्गोले में | ----------  विजयलक्ष्मी




इश्क औ गम का रिश्ता भला रिसता क्यूँ हैं ,,
मुस्कुराकर इश्क की चक्की में पिसता क्यूँ है || --- विजयलक्ष्मी




जीना सीखने के बाद भी आहत आहट रुला जाती है ,,
जिन्दगी अहसास के फूल पलको पर खिला जाती है ।।---- विजयलक्ष्मी




नम मौसम को बदलती है उमड़ते अहसास की गर्म चादर ,,
जिसे ओढकर अक्सर मातम भी खुशियों का राग सुनाता है।। ------- विजयलक्ष्मी

Friday, 7 December 2018

आहत उर की पीड़ा कविता बन गयी है

आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है

आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है
मानव की परवशता कविता बन गयी है ||

दुःख भरे विष प्याले पी मधु का स्वाद चखा
जग के अंतर की पीड़ा से मन में राग जगा 
दर्द की लहरों के निरंतर प्रवाह से कविता जग गयी
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||

समय के पत्थर के प्रहार प्रतिपल सहे हैं
बहते झरने दुःख के कब मुख से कहे हैं
है रीत प्रीत की पावन वही सविता लग रही है
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||

विराना सुना था उडती आंधियों का बसर है
जिन्दगी भी सुख दुःख की लहरों का सफर
मधुरिम प्रीत की रीत कैसे मन में चुभ गयी है
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||

प्रतिपल जग ने मेरी निश्छलता को आंका
दर्द के दरिया में तन्हा तिरा न कोई झाँका
क्रांति की इक चिंगारी मन के भीतर लग गयी है
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||

बदल गया है रूप रंग देश पाश्चात्य लगने लगा 
लगता है जीवन सोया व्यक्ति व्यक्ति से डरने लगा 
भरमवश कहूं या भरम में कह दूं भारत डोर उलझ गयी है 
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||

न रंग पुरातन न ढंग पुरातन हुए लाचार आचरण 
जननी को जीवन की बाधा भोला बिसरा सब व्याकरण 
ये कैसी लाचारी पनपी भारत संस्कृति धूमिल हुई है 
आहत उर की अंतर-पीड़ा कविता बन गयी है ||
--- विजयलक्ष्मी 

Thursday, 29 November 2018

मेरे शब्द दर्द से वाबस्ता थे ,,

मेरे शब्द दर्द से वाबस्ता थे ,,
लोगो ने शायरी समझी 
दर्द की हर कराहट में उभरी आह ..
लोगो ने अदावत ही समझी 
फितूर दिल का नजरों में आ गया 

उफ़ .. सरलता ने यही जिन्दगी समझी
हर शब्द चाशनी में पगा था
जिन्दगी खूबसूरत समझी
नहीं मालूम था व्यापार दिल का
हमने वही बन्दगी समझी ||

--- विजयलक्ष्मी

Sunday, 24 June 2018

रघुपति राघव राजाराम

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच । बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है।इतिहास जानकर हर व्यक्ति जनता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया ।
(कुरान के अनुसार दर-उल -इस्लाम = 100% मुस्लिम जनसँख्या )
वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया,लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव राजभार ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे । महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया।
हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव राजभार ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया। कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।
आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है। हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव भुला दिए गएँ है और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवन बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है।
अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ? रघुपति राघव राजा राम' भजन की असली धुन ।
'रघुपति राघव राजा राम' इस प्रसिद्ध भजन का नाम है..”राम धुन” .
जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने बड़ी चालाकी से इसमें परिवर्तन करते हुए अल्लाह शब्द जोड़ दिया..
आप भी नीचे देख लीजिए..
असली भजन और गाँधी द्वारा बेहद चालाकी से किया गया परिवर्तन..
गाँधी का भजन
रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान
** असली राम धुन भजन **
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम
अब सवाल ये उठता है, की, गाँधी को ये अधिकार किसने दिया की,..
हमारे श्री राम को सुमिरन करने के भजन में ही अल्लाह को घुसा दे..
अल्लाह का हमसे क्या संबंध?
क्या अब हिंदू अपने ईष्ट देव का ध्यान भी अपनी मर्ज़ी से नही ले सकता..?
और जिस भी व्यक्ति को हमारी बात से कष्ट हुआ हो..
वो इसी भजन को अल्लाह शब्द वाला संस्करण ज़रा किसी मस्जिद मे चलवा कर दिखा दे.. फिर हमसे कोई गीला शिकवा करे ।

Wednesday, 30 May 2018

जिन्दगी क्यूँकर सवाल है ,,

जिन्दगी क्यूँकर सवाल है ,,
क्यूँ तुम बिन लगे बेहाल है ||


अंखियों में तुम हो सांवरे 
तुम बिन अश्क का उबाल है||


चाँद बिन अँधेरी रात हुई 
हाँ ,ये मौसम ही नागंवार है||


ये तन्हाई लम्बी रातो से
खुशियों का पड़ा अकाल है ||


गुनाहगारी लिख दो नाम
हम यहीं तो हमख्याल है ||


ए जिन्दगी तुम भी खूब हो
क्या मुस्कान इक मलाल है || 


सदके में तेरे सबकुछ दिया
हुई अब जीस्त भी निहाल है ||


जख्म मेरे क्यूँ रख दू गिरवी
दर्द करता रफू भी कमाल है ||


सूरज चंदा अजब साथ बिन 
फूलों का खिलना मुहाल है ||
---------- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 23 May 2018

क्यूँ समस्या बनी रहे और आंच जलती रहे ?

क्यूँ समस्या बनी रहे और आंच जलती रहे
राजनीतिक रोटियां अच्छी सिकती रहे ?
इस राजनैतिक रोटियों के जमावड़े में कहो
वतन की जमी टुकडो में क्यूँकर बंटती रहे ||

सिसको ...सिसकना पड़े चाहे जिसको ..
ये धरती किसी स्वार्थी की बपौती नहीं है
देश के लिए करे और स्वावलम्बी बने ,,
खैरात मिले क्यूँकर मंजूर पनौती नहीं है ||

स्वच्छता का भी मजाक बना रखा है
जानबूझकर बिमारियों को गले रखा है
जो देश चलाने की ख्वाहिश पाले हैं
झूठ लोकतंत्र के लिए फैला रखा है ||

टुकड़े टुकड़े गैंग को धिक्कार धिक्कार
देशद्रोह रच रहें जो धिक्कार धिक्कार
सत्ता सुख के लिए जनता से ही धोखा
ऐसे शपथ लेने वालों को धिक्कार धिक्कार ||

दर्द जनता का होता गर घोटाले न करते
न पनपता आतंकवाद शुरुआत पर मरते
होतो ईमानदारी तो हम विश्व में न पिछड़ते
अमीर हुए वही जो मिले गरीबी पर लड़ते ||

माना लड़ने सरहद तक नहीं जा सकते हो ,,
स्वच्छता अभियान से राष्ट्र बचा सकते हो
समाज को बांटने वाले वही तो सत्ता चाहते हैं
मरे कोई यहाँ कौन इंसानियत जिन्दा चाहते हैं ||

मस्जिद की अजान से देशद्रोह क्यूँकर कहो
क्यूँकर पॉप को राजनीती से मतलब कहो
राम लगते सबको काल्पनिक क्यूँ है बताओ
प्रश्न चिह्न क्यूँ पैगम्बर और मसीह पर न हो ||
------ विजयलक्ष्मी

Saturday, 28 April 2018

कितना इंतजार लिखूं ..... ?

जाने भोर कब होगी ,
कितना इंतजार लिखूं ||
ख्वाब पलको पर है
रात ख्वाबगार लिखूं ||
तमन्ना मौत की हुई
या दिल बेकरार लिखूं ||
लिखूं अशरार वफा के
बेवफा उदगार लिखूं ||
तुम भूल भी जाओ गर
मैं तो एतबार लिखूं ||
होठो से बयाँ करूं ,कैसे
दिल को इश्तेहार लिखूं ||
झुकी सी आँखों में तुम
कैसे तेरा दीदार लिखूं ||
यूँतो गम भी है जिंदगानी में
सरेआम कैसे प्यार लिखूं ||
------ विजयलक्ष्मी

Monday, 2 April 2018

कलियों वाला चमन है तू.||


कलियों वाला चमन है तू.||
महकी महकी डगर है तू,

छाया हुआ हस्ती पर मेरी
लगता रहा अम्बर है तू ||

कौन किसके साथ चलता
कहदे किसका सफ़र है तू ||

ढूंढती रहती हैं नजरें
बतला मुझे किधर है तू ||

दुआ में है या पूजा में बैठा
या फ़क़ीरी का घर है तू ||

घूमी नजर खुदपर पर टिकी
ये कैसा जादूगर है तू ||

जो क्षितिज पर खेलती है
वो मिलती हुई नज़र है तू ||

लग रहा हुई भोर जैसे
या रौशनी का बसर है तू ||
------ विजयलक्ष्मी