Wednesday, 8 February 2017

" काटा गया इंसान हर बार,,वोट,वाद पर .."

" कभी जातिवाद पर कभी आतंकवाद पर ,,
काटा गया इंसान हर बार,,वोट,वाद पर ..
साम्प्रदायिकता पर कभी या वंशवाद पर,,
लुटती रही जनता सुन चोट गरीबवाद पर
जेबें फटी है मगर घूमते विदेश हैं साहिब ,,
हवाई चप्पल पाँव में मौज छुट्टीनाद् पर
किराए नहीं पैसे दिखावा मैट्रो सवार हुए
बेतुके इंसान सभी है राष्ट्रिय-विरोधवाद पर
केसरिया रंग जाने कब आतंकी हो गया
झगड़ा नहीं आतंकियों के मजहब-निनाद पर
जहां शांतिदूत बन्दूकों के साथ चल रहे हैं
खाली हाथ केसरिया रंग आतंकवाद पर
जिनको दी पनाह वो कैसे मालिक हो गये
जान औ माल सुरक्षा भी ठहरी बवाल पर
कभी कैराना कभी आसाम कभी बंगाल में
ढूंढिए जनाब पुरखे मिटे किस जंजाल पर
मैं नहीं ,थी पीढीयाँ अपनी भी युद्ध में ..
पायी है आजादी पूर्वजों ने खेलकर जान पर
बहुत हुआ आतंक अब और कितना सहेंगे
जिन्दगी भी कैसे कबतक रखेगी सम्भालकर ||
" ------- विजयलक्ष्मी

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