Saturday, 4 February 2017

" आजादी के सीने में घुटती चीख सुनो तुम ,,भूकम्प तो आया ,,बदस्तूर ........||"


भूकम्प तो आया ,बदस्तूर आया ,, लेकिन पाले बदल बदल कर ,,, जहां आना था नहीं आया ,,, धरती तो कांपी जोर से ... अस्तित्व के हिलने का अंतिम कगार का चेहरा मोहरा दर्शा कर गया ,,, दो -दो भूकम्प आये संसद के अंदर भी ...और संसद के बाहर भी भूकम्प था ,, पत्रकार और नेता रूपी डॉ और नर्स अपनी अपनी कैची लिए टटोल रहे थे ,,, कौन सी नस काटे जिससे साँस बंद हो जाये ... सरकार की और लोकतंत्र जो युवा हो रहा है उसे फिर से मृतप्राय कर बोरी बंद करके रख दे जैसे बरसों से किया था .......... लेकिन समय बदल रहा है ... सोच बदल रही है ...
वंशवाद की स्पष्ट रेखा क्रम को समझ रही है ,,, कोंग्रेस को पिछले चुनाव में ऐसा ICU में भर्ती किया है ..... पुराणी बिमारियों का इलाज किया जाना है ,,,
पुरानी जन्मो पर हुई विकृतियाँ ,,, तभी स्वस्थ्य लोकतंत्र पैदा किया जा सकता है .... विकृत बीमार जननी के बच्चे दिव्यांग या बिमारीग्रस्त ही रहते हैं .... या चोर उचक्के ,,अजब अजब औलादों ने जन्म लिया ... इस जननी का दावा कल सुसंस्कृत दाई के हाथो हुयी जाँच में हुनरमंद बैद्य की तरह नब्ज पकड़ी और जननी और औलादों की गिनती शुरू हुई ......... लोकतंत्र के नाम पर उपजे .. वंशवाद ,, आपातकाल ..मजहबवाद ,अंग्रेजियत गांधीवाद ,,लूटवाद फूटवाद जातिवाद खादीवाद ,, टूजी थ्रीजी ,, जितने भी अचारविचार भ्रष्टाचार थे अधिकार कर्तव्य के व्यक्तिगत कानूनची पर्सनललाज बायलाज लालसलाम ,370 जितनी भी औलादे गिनाई .......... उनमे लोकतंत्र का नाम तो था लेकिन वो खुद नदारत था ,,, सेकुलरिज्म के नाम पर साम्प्रदायिकता के साक्ष्य मिले ,,, इतिहास अपनी सुरत पर रो रहा था कोने में पड़ा हुआ .... जिसपर हर किस्सा कहानी महज जबानी था ...और वसीयत खानदानी हो चुकी थी ....... और सहायक बेचारे उठाकर भाग भी नहीं पा रहे थे ........ लग रहा था सर धुन रहे हैं किस घड़ी में मुद्दे बेमुद्दे हुए ... ये नया वैद्य तो नब्ज पकड़ते ही बीमारियाँ गिनाता है ........ दीखता चुप है इलाज क्या करेगा नहीं मालूम लेकिन बीमारी जड़ से खत्म होगी इसकी गारंटी दे रहा है ........अमा यार कोई तो बचाओ ..... ये बचायेंगे क्या ... वैसे शहीद भगतसिंह ,,चन्द्रशेखर आजाद बिस्मिल जी असली नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के संग अनेक शहीदों की आत्मा मुस्कुराई जरूर होगी ,,इस बात की शर्त लगा सकती हूँ ........ हर शब्द पर खिलखिलाए होंगे गाँधी जी ...... यह सोचकर जब भंग करने को कहा तो कोंग्रेस भंग नहीं की गयी न अब भुगतो पुराने घोटालो का भी मजा ,,,,, वरना अमर रहते इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा नाम यूं तो मिटटी में नहीं मिलता ,,, जनता से निसर्ग किया था ,, संसर्ग के स्थान पर अब इज्जत का फलूदा बना जा रहा है ,,, स्वस्थ्य लोकतंत्र तो जन संसर्ग से ही मिलेगा ........ आत्मा को नैसर्गिक करना होगा ,,,, अन्यथा ये बैंड तो यूँही बजेगा और हर बार आरती उतरेगी लेकिन ...वरमाला वही पड़ेगी ....दूल्हा यूँही नहीं बदला था ... दो साल पहले की गैस की लम्बी लाइन याद आगयी अचानक ........ नोटबदली में पचास दिन में तो लाइन से फारिग हुए ........ पहले तो गैस की लेने कभी टूटटी ही नहीं थी ,,, देह टूट जाती थी ,,,दिन निकल जाता था लेकिन ....रोटी बनेगी या नहीं .......नहीं मालूम था || इतिकृतम ||
-------- विजयलक्ष्मी

" आजादी के सीने में घुटती चीख सुनो तुम ,,
देखो उसके सीने सांसे कितनी बाकी हैं ,,
कुछ ख्वाबों को चुनकर उन आँखों पर धरना था 
भीगी पलकों के खारे जल से शुद्ध जहां करना था 
देशराग गूंजता है लहू के संग टकराकर मेरी धमनी में 
देता है टक्कर रह-रहकर इस दिल की दीवारों पर
और आँख धुंधलाई ठहरी है टिककर ..
खौफ है नजर से वो इक तस्वीर न धुल जाए ,,
बंद मुट्ठी का इक अधुरा सा ख्वाब न खुल जाये ,,
रणभेरी बज उठे तो फिर आराम कहाँ ,,
उठ खड़े होकर लड़ो ,,स्वाभिमान के लिए जीवन बना संग्राम यहाँ || "
--- विजयलक्ष्मी

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