Monday, 13 July 2015

" गृहस्थी माँ की ,,जेवर कपड़े खाना रहना सारी आजादी ..लेकिन ....."

कब छोडोगे छलना ..


सुना है -औरत नाच रही है नंगई नृत्य ,

बताओ तो - करता कौन है है यह कृत्य .
सुना है - औरत बिक रही है सरे बाजार ,
बताओ तो - क्यूँ हों गए हैं ऐसे आसार .
सुना है -वक्त की धार कुछ कुंद हों चली ,
बताओ तो - क्यूँ रौंदी जाती है खिलने से पहले कली .
सुना है - औरत हों गयी बदकार ,
बताओ तो - कौन करता  है उसका व्यापार .
सुना है - समाज खराब हों रहा है ,
बताओ तो - किसका दिमाग खराब हों रहा है .
सुना है -कीमत लगी है शरीरों की ,
बताओ तो - इबारत किस्मत में लिखी हुयी तकदीरों की .
सुना है - औरत हिस्सा है बराबर ही घर का ,
बताओ तो - कभी दिया है दर्जा क्या बराबर का .
सुना है - औरत घर की रानी होती है ,
बताओ तो - क्यूँ दुर्गति औरत की ही होती .
चलो बंद कर दो औरत का घर निकलना ,
बस एक यही हल है लगता तुमको बाकी ,
हे पुरुष !तुम इस निर्णय को न कभी बदलना...
औरत को स्वामिनी कहकर बताओगे क्या कब छोडोगे छलना 
------..विजयलक्ष्मी 



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" उम्र का चिन्तन करूं या अहसास का
नारी की विवशता को कोई नहीं समझता ..कभी कभी तो खुद भी नहीं
निर्णय क्यूँ नहीं ले लेती कोई ...मगर कैसा निर्णय
धर्माचरण के अनुसार पीछे चलने का या अपने को जिन्दा रखने का
मरना तो दोनों ही बार है ,,एक में खुद की नजर में दूसरी में समाज की नजर में
एक नजर औरभी है रिश्ते नातेदारों की नजर
और औरत होना जितने बड़ेगर्व की बात है उतना बड़ा अभिशाप भी है
क्यूँ गलत कह दिया कुछ ..?
हाँ हो सकता है लेकिन....
कुठाराघात ही तो है उसे जन्मने से पहले ही संघर्षरत होना है..
यद्यपि कानून है किन्तु मृतप्राय से,
जन्म से पहले लिंग जाँच असम्भव लेकिन.....मंत्रीसंतरियों के यहाँ ज्यादातर लडके हीक्यूँ ?
अजी दौलत वालों के घर लडकों का ठेका होता है मेज के और मिलनसारिता का ,,
सबूत मत माँगना ...ढूंढें से भी नहीं मिलेगा.
माँ ऊँचे घराने की बहु होकर आजाद तो है लेकिन आखिरी निर्णय मुखिया का
गृहस्थी माँ की ,,जेवर कपड़े खाना रहना सारी आजादी ..लेकिन जीवन के निर्णय.. मुखिया के
सांसे माँ की सोच माँ की लेकिन ...उनपर अमल करने की आजादी ..मुखिया की
नवजीवन के सृजन और प्रसव का माध्यम तो है लेकिन अंतिम हाँ या ना निर्णय मुखिया का
हाँ यही है हमारे देश की औरतों की आजादी ,,रोटी खा और घर सजा लेकिन सोचना मना
विचारों को सामने लाना मतलब अनजाम भुगतने को तैयार रहो ,,
बीमार होकर मर सकती हो ,
एक्सीडेंट हो सकता है ,
पागल भी हो सकती ,
कुछ भी नहीं तो आखिरी हथियार सोसाईट ..वो भी लिखित बयान के साथ जिससे बाकि सब आजाद ,
जिसपर कोई रोक नहीं
हे औरत , इतनी आजादी के बाद भी पुरुष पर इल्जाम ,..सुधर |
सामाजिक सुरक्षा ,
जीवन सुरक्षा
भरण पोषण सुरक्षा
दैहिक भौतिक सुरक्षा ...फिर भी इल्जाम पुरुष पर ,....सुधर |" ---- विजयलक्ष्मी

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