Saturday, 4 April 2015

" इंतजार है इक सहर का ,"

इंतजार ..
हर रात को
इंतजार है 
इक सहर का ,
हर नये प्रहर का 
जब ..
उजाला ही उजाला होगा चहुँ ओर
और
निराशा के पुष्प भी
आशा के रंग में रंगे जायेंगे..
मुस्कुराहट होगी हर चेहरे पर
महकता होगा हर मंजर
भूख खो जाएगी
निराशा तिर जाएगी
गरीबी बिक चुकी होगी
और जिन्दगी बिखेरती मिलेगी ख़ुशबू
बस
किसान गुनगुनाते मिलेंगे
सरहद पर सिपाही खिलखिलाते मिलेंगे
जब
वही इक सहर
इंतजार ..
हर रात को
इंतजार है
इक सहर का ,
हर नये प्रहर का
जब ..
उजाला ही उजाला होगा चहुँ ओर--- विजयलक्ष्मी 

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