Sunday, 5 April 2015

" मन बदरा बना हम बरसते रहे "

बेरंग सी राहे मिली बहुत हम उनमे ही रंग भरते रहे ||
गुजरते मिले नक्श ए कारवाँ सब उसी डगर से गुजरते रहे ||
जहर भरा कूजा ए जिंदगानी उम्रभर उसी को निगलते रहे ||
बंजर जमी फसल को तरसती मन बदरा बना हम बरसते रहे ||
लहर से मचलना सीखू कैसे नाखुदा संग डूबते उतरते रहे ||
अहसास समन्दर में तिरे खूब फाख्ता सी याद मुंडेर उतरते रहे ||

--- विजयलक्ष्मी

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