Sunday, 5 April 2015

"माचिस में आफ़ताब कोई ठीक नहीं"

ख्वाबों पर माना कोई रोक नहीं ,,
नागवार गुजरे ख्वाब कोई ठीक नहीं
मशक्कत ए पैमाना ए नजर हुई 
माचिस में आफ़ताब कोई ठीक नहीं
खुशबू ओ गुल महकता उपवन
काँटों बिन यूँ गुलाब कोई ठीक नहीं 
रंग ए नाज ओ अदा बिखरे से 
बे-पर्दा बिखरे शबाब कोई ठीक नहीं 
सितारों जड़ी चुनर ओढ़े यामिनी
नजर चुराले महताब कोई ठीक नहीं ---- विजयलक्ष्मी


No comments:

Post a comment