Sunday, 29 November 2015

" तुम निरंकुश स्वच्छन्दता के तलबगार ठहरे "

" बहुत कुछ गिर रहा है ,,
सोने की कीमत
इंसानी हिम्मत
अहसास से इंसानियत
मन से दया
चेहरों से मुखौटे ..
दिमाग से जमीर
सभ्यता की जंजीर
ईमान से फकीर
स्वार्थ में नेता
मतलब में धर्म
देशप्रेम से धर्म
जीवन का मर्म
आँख से शर्म
हया का पर्दा
लोन में कर्जा
फर्ज खो गया
ईमान सो गया
खुद्दारी अहंकार में तब्दील हुई
जिन्दगी ऐशगाह में रंगीन हुई
इंसानियत एके 47 संगीन हुई
मरो मारो..झूठ को सच के सामने उतारो
दर्द सहकर चुप रहो..
बोले तो ...बोलेगा फिल्मकार
कोई साहित्यकार
मिलकर कोई गद्दार
असहिष्णुता बढ़ गयी है यार
कैसे होगा व्यापार ..
हाँ भाई ...असहिष्णुता बढ़ गयी है...
कभी खुद के गिरेबान में भी झाँक ..
मुझे स्वतंत्रता भी नसीब नहीं ..और,,,
तुम निरंकुश स्वच्छन्दता के तलबगार ठहरे "
----- विजयलक्ष्मी

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