Thursday, 26 November 2015

" नजर बचाकर मेरी झाँका हो जैसे तुमने .. ||"



" साँझ ढल गयी थी,,सूरज सोने चला गया ,
मैं देखती थी चाँद ,,दिल मेरा छला गया ,
बादलों की ओट से कुछ यूँ झांकता था वो ..
नजर बचाकर मेरी झाँका हो जैसे तुमने .. ||
इक हवा का झोंका उड़ा छूकर इसकदर ,
बगिया खिली खिली और घूमता भ्रमर ,
नृत्य करती तितलियाँ इठलाती थी कभी
चंदा बन गगन से ताका हो जैसे तुमने ...||
अहसास इक रूहानी छलका सा आसमां,
गिरती थी ओस नयन पर ,, चाँद राजदां ,
भीगी सी चांदनी आंचल छूकर गुजर गयी ..
लगा तन्हाई को मन की आंका हो जैसे तुमने ||
"
--- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment