Tuesday, 17 July 2012
यूँ भी दवा नहीं देते ..
गुंचा ए गुल खिल के सदा रंगत नहीं देते ,
बढाते हैं दर्द ही अक्सर,यूँ भी दवा नहीं देते .
मेरे चमन से तो यूँभी बहारों को दुष्मनी है ,
खाया है तरस ही वर्ना कांटे भी नहीं देते .
आग ए नफरत ही सही तुममे मौजूद हम हैं,
सोचो , नफरत को भी वर्ना इजाजत ही नहीं देते.
इस उजड़े चमन मैं क्या है तन्हाई के सिवा ,
जुदा कहाँ वर्ना नजरों की रुसवाई भी नहीं देते.
खामोश निगाहें भी अहसास बढाती दिल का
बादर्द पैगाम ए निगाह वर्ना नाराजगी नहीं देते.-विजयलक्ष्मी
बढाते हैं दर्द ही अक्सर,यूँ भी दवा नहीं देते .
मेरे चमन से तो यूँभी बहारों को दुष्मनी है ,
खाया है तरस ही वर्ना कांटे भी नहीं देते .
आग ए नफरत ही सही तुममे मौजूद हम हैं,
सोचो , नफरत को भी वर्ना इजाजत ही नहीं देते.
इस उजड़े चमन मैं क्या है तन्हाई के सिवा ,
जुदा कहाँ वर्ना नजरों की रुसवाई भी नहीं देते.
खामोश निगाहें भी अहसास बढाती दिल का
बादर्द पैगाम ए निगाह वर्ना नाराजगी नहीं देते.-विजयलक्ष्मी
—
सन्नाटे में गीतों की स्वरलहरी उठेगी ...
मेघा बरसता ही नहीं सावन सूख रहा है ,
धरा जल रही है कूद में ही भीतर जख्म भर ही नहीं पाते
तपिश जला रही है हिमालय की गोद उजड रही है..
भागरथी निकल कर बहने लगी है सरहद से ..
वक्त सहमकर खड़ा है फिर ..
उड़ जायेंगे बादल ..मानसून की खबर अच्छी नहीं है ..
कुछ दिन तक बरसात न होगी यहाँ ...सूखे के आसार बन रहे है
सुना है कृष्ण की कर्मस्थली यमुना के किनारे बहुत ही खूबसूरती से बसी है ...
क्या बांसुरी आज भी सुनाई देती है वहाँ ...सुन सकेंगे क्या ..
सन्नाटे में गीतों की स्वरलहरी उठेगी ....
असर दूर दूर तलक होगा ...संगीत सुनेगा जो भीतर बजता है
अंतर्मन में बस जायेंगे वो पल तुम भी सुनना ..महसूस करना .विजयलक्ष्मी
Monday, 16 July 2012
यही एक कारण
मेरी व्यथा तो,....मैं ही हूँ ,
मेरा कष्ट ..उतरना फलक से तुम्हारा ,
बेकल सी वीणा विकलता है स्वरों मैं ,
खुद में ही बिखरती हूँ पल पल यही एक कारण ...||
समझ में आता नहीं कुछ...
बिखरा हुआ सा हर एक राग है क्यूँ
टूटके है अम्बर जमीं पे आ गया है....
बहती हूँ उन्ही आंसूंओं मैं संग संग यही एक कारण ...||
विरक्ति पुकारे क्यूँ ...
समा जाये धरती कहाँ बिन गगन के ,
छाया है ऐसे सावन का घनघोर बादल ,
बिखरता है मन चटक चटक कर यही एक कारण ...||
रूह का रूह मैं अहसास है कुछ ...
सहर का उजाला सूर्यकिरण बिन होता कहाँ है
स्वप्निल सी दुनिया , नूर किसका समाया है ,
था फलक पे बैठाना ,क्यूँ नीचे उतारा यही एक कारण ...||
इंसान हूँ ,इंसानियत भी है इतनी ...
संताप ने तोडा , पत्थर हूँ अहसास हुआ जब
खुशियों के बदले ,दुःख और कांटे है बांटे क्यूँ हमने
न समझे हों तुम ही ,कोई समझेगा कैसे यही एक कारण ...||विजयलक्ष्मी
मेरा कष्ट ..उतरना फलक से तुम्हारा ,
बेकल सी वीणा विकलता है स्वरों मैं ,
खुद में ही बिखरती हूँ पल पल यही एक कारण ...||
समझ में आता नहीं कुछ...
बिखरा हुआ सा हर एक राग है क्यूँ
टूटके है अम्बर जमीं पे आ गया है....
बहती हूँ उन्ही आंसूंओं मैं संग संग यही एक कारण ...||
विरक्ति पुकारे क्यूँ ...
समा जाये धरती कहाँ बिन गगन के ,
छाया है ऐसे सावन का घनघोर बादल ,
बिखरता है मन चटक चटक कर यही एक कारण ...||
रूह का रूह मैं अहसास है कुछ ...
सहर का उजाला सूर्यकिरण बिन होता कहाँ है
स्वप्निल सी दुनिया , नूर किसका समाया है ,
था फलक पे बैठाना ,क्यूँ नीचे उतारा यही एक कारण ...||
इंसान हूँ ,इंसानियत भी है इतनी ...
संताप ने तोडा , पत्थर हूँ अहसास हुआ जब
खुशियों के बदले ,दुःख और कांटे है बांटे क्यूँ हमने
न समझे हों तुम ही ,कोई समझेगा कैसे यही एक कारण ...||विजयलक्ष्मी
Sunday, 15 July 2012
आज की सत्य कथाएँ
बस गाँधी जी के तीन बंदर ..
न देखो, सुनकर फिर बोलना क्यूँ ,
गुण चाहिए सब बस एक के अंदर ,
ओह ..राज शब्द कुछ अजब सा हुआ था
पिता की नजर ...क्यूँ घबरा गयी बेटी ..
भाई के हाथ वो दुपट्टा था किसका ..
माँ ने भी रोटी उसी की खतिर धरी थी ,
शंशय की दुनिया बहुत ही अजब है..
चुभती सी नजरें नोंचती सी शरीर ,
पड़ने लगी पत्थर पे लकीरें ...
शक की बेल ..रूकती नहीं है कभी भी ..
ज्वालामुखी की दरारें न भरती ..
अंगूर बोने से खेती लाजवाब होती ..
जिंदगी का देखना पक्का हिसाब है..
खौफ क्यूँ ,अविश्वास की कच्ची होती ताब है ,
सहमे से चेहरे सबके ही भीतर समाये ..
डस न सके कोई ,....थे खंजर उठाये ,
झाँसी की लक्ष्मी बाई ..देखना मेरी ही बेटी न बन जाये ,
जरूरी है मगर जमीं पे वो आये ..
स्वार्थ की जमीं को खादपानी क्यूँ सुहाए ...
भाई के खून से रंगे है हाथ ,चलता देता कंधा साथ ,
हर कोई घात बैठा है घात लगाये ...चलें बहुत बात हों गयी ...
किस्सा नहीं है आज की ये सत्यकथाएं .--विजयलक्ष्मी .
Subscribe to:
Posts (Atom)

.jpg)