Monday, 12 March 2018

दिखाए पैमाने ईमान के ऊँचे ख्वाब में ...

दिखाए पैमाने ईमान के ऊँचे ख्वाब में |
हकीकत की जमीन पर लुडके फिर रहे हैं ||
खोदे थे गड्ढे गहरे औरो तले जमीन में |
लडखडा के देखिये अपने आप गिर रहे हैं ||
ये बहारों के मौसम कभी हमारे भी होंगे |
यही सोच लिए ख्वाब पलको पे तिर रहे हैं ||
कुछ तो कुसूर है इस दिल का भी जरूर |
अहसास के समन्दर तूफान से घिर रहे हैं ||
चरित्र लापता जमीर खो गया ईमान से |
दोगली बाते करते हुए लोगो से घिर रहे हैं ||
--- विजयलक्ष्मी

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