Monday, 11 April 2016

.. जितना नीचे गिर सकोगे .... कई गुना ऊँचा पहुंचोगे ||

पहला अवार्ड ...पहली कहानी...पहली फिल्म ..एक औरत की सत्य कथा उंचाई की तरफ बढ़ते कदम ... और कितनी बार गिरी या गिराई गयी ... धकेली गयी .. अवार्ड पाने तक ..कहानी कहानीकार की ... फिल्मकार एडिटर सब बनी .. लेकिन कीमत एक ... मुझे संकोच था बताने में.. उसके साथ बीती थी .... खड़ी थी गुमनाम जिन्दगी से निकल सभ्य समाज की बुलंदी पर...... और हर सीढ़ि बिस्तर से होकर गुजरी | पुरुस्कार जिसके बलपर मिला था .... इच्छाशक्ति ....... और धन्यवाद के दो शब्दों में बोली ..... इस देह ने मुझे यहाँ तक पहुंचा ही दिया आखिर .. कीमत चुकाई हर बार | आज समझ आई दुनिया की नजर से काबलियत ...... जितना नीचे गिर सकोगे .... कई गुना ऊँचा पहुंचोगे ||
---------- विजयलक्ष्मी

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