Tuesday, 20 October 2015

" तुम्हे कृष्ण मान ........ "


" तुम आइना हो जिसे देखकर संवरते हैं 
छनक कर टूट न जाओ छूने से डरते हैं ||


एतबार है इतना सीरत खुदाई हो जैसे ,
गुरुर सर न चढ़ जाये कहने से डरते हैं ||


डर जमाने से कहूँ , हमे खुद से लगता है
अपना कहूँ ख्वाहिश थी खोने से डरते हैं ||


मेरी तन्हाई, मेरी रूह पर असर दीखता है 
ठहरा है नाम भीतर, रुसवाई से डरते हैं ||


तुम्हे कृष्ण मान मीरा हो जाती हूँ अक्सर 
मन वीणा का राग तुम्ही,गाने से डरते हैं ||"

 ---- विजयलक्ष्मी

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