Wednesday, 26 August 2015

" आओ ..लिए तिरंगा हाथ, मिलकर साथ " जयहिंद " अलख लगाते हैं "




" आओं विचारे राष्ट्र को पुकारे ,
क्या साथ दोगे ...?
मेरा नहीं वतन का
कैसी विडम्बना ...जिन्हें वन्देमातरम से परहेज,
जिन्हें जय भारत कहना अखरता है
जिन्हें धरती का सीना दुश्मन सा लगता है,
जो फहराते दुश्मन का झंडा ,,,
अलगाववाद ही जिनका फंडा ,
जो बसों को आग लगाते है,
देश को झोंक युद्ध में गाते हैं गीत
कोई तो बताये कैसी है राष्ट्र से प्रीत
कैसे गूंजेगा मीठा गान ,,,
सुरों का कैसे हो मिलान ..
पड़ा है अक्ल पर वितान ..किरण सूरज कैसे बिखरेगी ,,
अन्तस् में कैसे रौशनी निखरेगी..
सच कहना क्या सुनकर ऐसा राग नियत नहीं बदलेगी ,
विश्वास क्यूँ डोलता है..धर्म वतन से आगे क्यूँ बोलता है,,
जिन्हें वतन की आन नहीं भाती ,शान नहीं लुभाती ..
उन संग निभानी मुहब्बत की रीत नहीं आती ,,,
जिसे वतन की जीत नहीं प्यारी ..उनकी हमे कोई चीज नहीं प्यारी..
जिन्हें वतन परस्ती भाती है ,,
बिन देशराग के जिन्हें नींद नहीं आती है ..
उनकी यादों से नई दुनिया घड़ जाते हैं ...
वतनपरस्ती के सम्मुख शीश झुकाते हैं ,,
आओ ..लिए तिरंगा हाथ, मिलकर साथ " जयहिंद " अलख लगाते हैं
"----- विजयलक्ष्मी



आतंकवादी मतलब शिकार ,, भून दो ।बिल्कुल वैसे ही जैसे सलमान ने काला हिरन मारा था ।जिंदा बचा तो फिर आएगा पकड़ा गया तो जनता की दौलत वकील की फीस न्यायालय का समय कितनी बरबादी होती है...बचाने के लिए ढकोसलेबाजी ,,जो मानवाधिकारी इंसानों की हत्या पर चुप्पी बांधे हो उनकी आवाज भी हलक को छेदकर बाहर आने लगती है...हाँ कोई धर्म नहीं होता आतंकवादी का फिर धार्मिक उन्माद क्यूँ ...इसी जहर के फैलने से पहले सीधे निशाना...और...खेल खत्म ...इंसानियत जिन्दा रहे ...कोई भी धर्म लड़ना नहीं सिखाता ..जो लड़ना सिखाता है वो धर्म नहीं हो सकता ...स्वरक्षा आवश्यक है ...अत: अहिंसा परमोधर्म एक सीमा तक सीमा लांघने वाले को सबक जरूरी है न..कुछ गलत तो नहीं है न . " ----- एक नागरिक

No comments:

Post a comment