Sunday, 14 April 2013

हो पत्थर ही ..!

मुस्कुराये क्यूँ ?
हंसना हुआ मना 
हंस दिए न !

जख्म खाए है 
हुयी रुसवाई है 
मुस्कुरा तो दो !

आंसू निकले 
बही धारा गम की 
लब मुस्काए !

रीता बर्तन
रीता सा मन हुआ
भाव बेभाव !

चाह कितना
पूजा कितना तुम्हे
हो पत्थर ही
.- विजयलक्ष्मी

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