Sunday, 7 April 2013

हम नत मस्तक खड़े मिलेंगे ,,

युद्ध ..विध्वंश ..
अंत संस्कृतियों का या 
सृजन की पहली सीढी..
बाहर कोकिला की आवाज सुन रही है ..
साथ एक और पंछी चल दिया ..
वही  से कौवे ने भी कांव कांव् सुना दी ..
बाहर देखने पर कोई नहीं दिखा ..
फिर भी रस माधुरी सी घुल गयी हृदय के कोने पर ..
पंछियों की कलरव से ..
कलरव ..जी हाँ ..बहुत मीठा सा शब्द है ..
क्या उसमे कौवा शामिल नहीं ..
संस्कृतियाँ ..उनका मेल ..कुछ जुड़ता है कुछ टूटता है ..
सृजन और विनाश चलता है साथ ..
अधूरे है एक दुसरे के बिना या ...
पूरक है ...ये सत्य प्रतीत हुआ ..
कत्ल ए आम न होगा तो....
कत्ल ए खास तक कैसे पंहुचा जाये ...
जनपथ से होकर ही राजपथ तक पहुंचा जा सकता है ..
केंद्र की सरकार अस्थिर हो चुकी है ..
इन्तजार ...देख रहे हैं सब ...ऊंट किस करवट बैठेगा ...
और ...
मंथन ..सतत प्रक्रिया है ..रूकती कब है ..
बताओ ..क्या तुम रोक सके हो ..
या रोक सकते हो ..
यदि हाँ ...तो ..
तो तुम वास्तव में महान कहे जाओगे ..
और हम नत मस्तक खड़े मिलेंगे ..
तुम्हारी महानता के समक्ष ..!!
..- विजयलक्ष्मी

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