Monday, 7 January 2013

झकझोर कर उठे वक्त भी ..

मर्यादा में लिपटी हुयी तहजीब ,
जिंदगी का अहसास बेहिसाब ,
जूनून या हकीकत तस्दीक करते हुए से ख्वाब ,
दिमागी कसरत क्यूँ बेसबब है ...
रूह की आवाज ..सन्नाटे का चीखना ,
नम होती सरहद ,भीगी सी जमी 
माँ की लोरी और ममता का गर्म सा अहसास ..
छूटता कब है कोई आवाज बुलाती है ,
हवा भी खबर पंहुचाती है ,
इतनी शिद्दत से झांकते हों शब्दों की आत्मा में क्यूँ भला ..
झकझोर कर उठे वक्त भी .-विजयलक्ष्मी

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