Tuesday, 13 December 2016

" बेगैरत ये " रस्म ए हलाला "अब गले उतरती नहीं "

" ये सादगी लिए इमानदारी की ही चुप्पी
बे-ईमानों को पिलाती अमृत की घुट्टी " --- विजयलक्ष्मी
..



1.
मैहर में मिले जख्म क्यूँ भले से लगे ,,
तलाक कबूल हो कैसे भीनी सी महक उतरती नहीं ||
इक उम्र खोई कमसिन ख्यालों की हमने 
लगे "तीन पत्थर " जिन्दगी सफर पर चलती नहीं || 
काश समझा होता इंसान हमे भी कभी तो 
बेगैरत ये " रस्म ए हलाला "अब गले उतरती नहीं ||
---- विजयलक्ष्मी

..2 .
वाह से आह तक का ये सफर ,,
हो गयी खुदाई हमसे बेखबर ||
बासब्र वक्त कटता नहीं चैन से
ख्वाहिश ए जिन्दगी सा रहबर ||

ईमान अब खो रहा बेवक्त चैन
खबर की तलाश में हुए बेखबर ||
सोचते रहे रपट लिखवाये कहाँ
कोई थाना लिखता नहीं अक्षर ||
बेलाग सिरफिरी ये साँझ गुजरी
बेखबर की रखे भला कैसे खबर ||
उम्र का इक खुबसुरत ये पडाव
उफ़ तलाश ए उज्र का है सफर ||
क्या लिखे बानगी दिल की भला
दिल अपना रहा दिल से बेखबर ||
भूल अहसास दिल के जाये कहाँ
बेरहम दुनिया, सहरा हर सफर ||
लौटती है साँस भी धमकाकर
न लौटूं गर कैसे करोगी सबर ||
बेवफा ये साँस भी तो निभ रही है
क्या मिलेगा तन्हाई को सोचकर ||
मुस्कुरा लेते हैं अब तन्हा पलो में
आह हो या वाह यूँही बीतेगा सफर ||
-------- विजयलक्ष्मी

..
" जीवन का प्रवाह 
न सन्यास न उच्छ्लन्खता 
न सियासतदारी है 
न रियासतदारी है 
न त्याग की गाथा ही उतारती है उस छोर 
न स्वार्थ की कामना
न इश्वर से होने वाला सामना
न इश्वर तुल्य होने की इच्छा
न कृष्ण राम या शिव होने की उत्कंठा
न पर्वत सी पीर न समन्दर के तीर
न दर्द सुमेरु बनने की
न उत्कंठा आकंठ भरने की
क्या करना महान बनू मैं बहुत
न गणना पुष्पित डालो की
न चिंता सांसारिक भालो की
न उद्वेलित मन विरानो सा
न चाहा बागों सा खिलना
विरानो के काँटों में पुष्प बना
घनी धूप में वृक्ष घना
सहरा में बदली सा होकर बरस बरस बरसा दे मना
जब रात अँधेरी चंदा सा चमकू
चमक चांदनी रौशनी भर दू
मुस्कान बना सूखे होठो की
उलझे लट जख्मी आहटो की
बन नदिया सा बहना सिखला दो
मुझको थोडा पत्थर सा बना दो
न राह अधूरी कुछ जीवन की मारामारी
पर्वत पर बर्फ सा थोडा संघर्ष सा
करता विमर्श सा
नफरत को ताले में बंद रखना
प्रेम की धारा को नदिया सा हौसला देना
वृक्ष की खोखर में पंछी का घोसला बनेगा
तिनका चिड़िया दाना ..
जाल पंख जीवन का खेला
जिसको लेकर भी मन चले अकेला
बन सन्यासी त्याग करू जमघट का
लेकिन इच्छा हो वासी जैसे मरघट का
कभी मिलना हो गर प्रभु से अपने
लालसा मुझसे ज्यादा हो
हर बार साथ का वादा हो
जब बिछुडू नमी आँखों में
इंतजार बातो में
रास्ता कटे रातो में
दिन याद में जिन्दगी के साथ में
मयूर से नाचते हो मन के जंगल में
गुरबत हो या सत्ता न हैवानियत देना
मुझे ईश्वरत्व नहीं इंसानियत देना
जीवन का प्रवाह
न सन्यास न उच्छ्लन्खता
न सियासतदारी है
न रियासतदारी है
न त्याग की गाथा ही उतारती है उस छोर
क्षितिज के उस और मिलना
जहां धरा गगन मिलते हो गले
जहां कोई न दुनियावी तीर चले
जहां फरिश्ते भी रिश्ते से होकर आँखों में तिर जाते है
"" --- विजयलक्ष्मी

वीर शिवाजी का समाधिस्थल ...|| जय हो ,हिन्द के लाल ||

तस्वीर में दिख रही ये जगह आपको कोई उजाड़ मंदिर या कोई पुराना महल लग रही होगी, लेकिन इस जगह की सच्चाई बहुत ही चौकाने वाली हैं..
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ये जगह महाराष्ट्र के रायगड किले में स्थित हैं…
ये जगह असल में अपने समय के " सबसे ताकतवर हिन्दू शासक शिवाजी की समाधि" हैं….


जी हाँ शिवाजी के नाम से तो इस देश का बच्चा बच्चा वाकिफ हैं..वो ही शिवाजी जिन्होंने एक साथ कई बाहरी ताकतों से लोहा लिया..


अपना स्वंतंत्र हिन्दवी स्वराज स्थापित किया…


आज देखिये हम लोग उन महान आत्मा की मिट्टी की क्या इज्ज़त कर रहे हैं…


मजारों पर इस देश के बहुत से हिन्दू जाते हैं, लेकिन कितने हिन्दू शिवाजी की समाधि पर दिया जलाते हैं ?
अगर यही मजार होता तो हिन्दू पहुंच कर चादर और अगरबत्ती की लाईन में लग गया होता !!


इसलिए हिन्दुओं पतन हो रहा है !!

अपने प्रतीक आक्रान्ताओं के नहीं वीरों को बनाइए ,, अपने वास्तविक हीरो से सीखिए ... फ़िल्मी और दिखावटी लोगो से नहीं ||




Monday, 12 December 2016

" इंसान कहो माना किसने संशय अस्तित्व बचे कैसे "

" प्यार का सीधा अर्थ दैहिकता से जोड़ा जाता है ,,
ये दीगर है नारी देह को नजर से निचौडा जाता है ||


बर्दाश्त करें तो रहने को घर खाने को निवाले हैं 
पलट कुछ उंचा बोली तो राहों पर छोड़ा जाता है || 


हक की बात करे कैसे क्या हक कुछ कहने का
मन से विरत नजर फिरे तबियत से तोडा जाता है ||


दान दहेज़ उसके गहने शिक्षा को दोहन खूब हुआ
पढ़ी लिखी इल्जाम हजारो रिश्तों में जोड़ा जाता है ||


इंसान कहो माना किसने संशय अस्तित्व बचे कैसे
जन्म से पहले ही लडकी, कैची से खकौड़ा जाता है ||"
--------- विजयलक्ष्मी

Monday, 5 December 2016

" हमे याद हैं तन्हाईयाँ ,,वो भूल गये महफिल "

" मुस्कुरा रहा है वक्त ताकू पर रखकर हमे ,,
जिन्दगी की होलिका हम भी जलाये बैठे हैं
|| " --- विजयलक्ष्मी


"कुछ सुनहरी सी यादें ,,फिर कुरेद गयी दिल ,,
हमे याद हैं तन्हाईयाँ ,,वो भूल गये महफिल  ||" ---- विजयलक्ष्मी


"कब गठरियों की गाँठ बदली रंगरेज ने ,,
कुछ पंचरंगी चुनरिया बंट रही दहेज में  || "  -------- विजयलक्ष्मी


" हर कोई चकमक सा पर्दा लिए है साथ में ,,
रेशमी अहसास जगाने के लिए ,,
आँखों में लगा हो तो ख़ूबसूरती बढती है
भूलकर ईमान पैबंद दौलत का लगाये बैठे हैं ||
कोई चुप गमगीन यादों के सिलसिले लिए
मुस्कुराने की चाहत दबाये दिल के कोने में
किसी को दर्प है कुव्वत ए फितरत पर
वफा का रंग कन्धों पर शाल सा ढांपे बैठे हैं ||
सर्द मौसम में किये चर्चे गर्मागर्म
वो ताश के पत्ते से बिखरते हुए अहसास
चीड़ की मानिंद अडिग पत्तों को छोड़ते हुए
बुजुर्गवा से धवल पर्वत चिंतातुर मन में बैठे हैं ||
गिनते है समय-दर्पण में बरस बीते लम्हे
गिरते पहाड़ी झरनों के जल-प्रपात ह्रदय पटल पर
कुछ अखरे से कुछ बिखर कर निखरे से
कुछ फसल कीट खा गयी जैसे सर पकड़े बैठे हैं ||
"  ------- विजयलक्ष्मी

" झंडे बेचते हैं साहेब देश की नीलामी नहीं करते || "

" पीपल के पेड़ पर दीपक जलाना अन्धविश्वास..
फिर क्रिसमस ट्र्रीपर लाइट लगाना अच्छा कैसे ?
तुम चादर चढाओ मुर्दों पर ,,,तुम्हे कब किसने रोका है 
लेकिन बतलाओ रंग खेलने पर मुझको क्यूँकर टोका है?
दीपावली पर जलते पटाखों से प्रदुषण भरता किलकारियां ,,
फिर नये साल पर अंग्रेजी क्यूँ होती आतिशबाजियां ?
अपने मजहब देहलीज के भीतर ही सजाओ ,,
राष्ट्रहित में ईमान से जमीर की बंशी बजाओ
जितनी आजादी सबको है उतनी हम भी मांगेगे
वरना सबको ही अब हम कानूनी खूंटी पर टांगेगे
मेहनत की कमाई है नमकहरामी नहीं करते
झंडे बेचते हैं साहेब देश की नीलामी नहीं करते ||
" -------- विजयलक्ष्मी