Saturday, 9 January 2016

असहिष्णुता vs शहादत

कैसे विकास हो उस देश का.........
जहां डेढ लाख सैलरी हर महीना पाने वाले सांसदो की सैलरी incometax free........
और 24 घंटे मौत की छांव मे रहने वाले सिपाही को बीस हजार सैलरी पर भी incometax देना पडता है....
सांसदो को परिवार के साथ रहते हुए भी हर साल पचास हजार phone call free..
घर से हजारो km. दूर बैठे सैनिक को एक call भी free नही...
एक सांसद को फर्नीचर के लिए 75000 हजार रु,
बार्डर पर सैनिक को ड्यूटी के दौरान बारिस से बचने के लिए टूटी हुई छप्पर...
सांसद को हर साल 34 हवाई टिकट मुफ्त,
सैनिक ड्यूटी जाते हुए भी अपने पैसे से टिकट लेता है........
सांसद को वाहन के लिए 400000rs का ब्याज free लोन
एक सैनिक को घर के लिए लोन भी 12% दर से मिलता है.......
🏿🏻और ये सब वहां हो रहा है जहां पूरा देश इस सैनिक की वजह से अपने परिवार के साथ चैन से सोता है
क्या यही है Digital India....
ऐसी स्थिती मे आप देश का विकास करने की सोच रहे है॥
और देश के सभी नागरिको को भी इस बारे मे सोचने की बहुत जरुरत है
पहाड़ में फंसी एक बेटी ने
अपनी मां से पूछा - मां रेडियो पे
सुना ईंडिया जीत गई,
जो खेल रहे थे उन्हे एक करोड़
रुपिया मिला !
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मां बोली – हाँ बेटी,
सरकार कहती है वो देश के लिए खेल रहे थे इसलिए !
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बेटी आसमान में हैलीकॉप्टर से लटकते
जवान को देख के बोली
- मां क्या इन्हे भी मिलेगा एक करोड़ ?
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मां बोली – ना बेटी ना,
हमारे यहां बल्ले से खेलने वाले को ईनाम
मिलता है, जान से खेलने वाले को नही !!
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शहीदों के सम्मान में ।
जय हिन्द — feeling thoughtful.

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टीचर- चलो अर्जुन खड़े हो जाओ, असहिष्णुता पर निबंध सुनाओ..
अर्जुन- टीचर जी असहिष्णुता 2 प्रकार की होती है...एक अच्छी असहिष्णुता और दूसरी बुरी असहिष्णुता...
टीचर- जरा विस्तार से सुनाओ
अर्जुन- टीचर जी अभी कुछ महीनों पहले उत्तरप्रदेश के दादरी में कुछ आतंकवादियों की भीड़ ने आक्रोश में आकर एक मासूम निर्दोष शांतिप्रिय अख़लाक़ को मौत के घाट उतार दिया...ये है बुरी असहिष्णुता....क्योंकि इसका देश भर में विरोध हुआ...बहुत से बड़े बड़े साहित्यकारों ने विरोधस्वरूप अपने अवार्ड वापस कर दिए...कुछ ने तो अवार्ड के साथ मिले पैसे भी वापस किये...सभी सेक्युलर नेताओं ने भी उसका खूब विरोध किया....विरोध स्वरूप संसद का एक पूरा सत्र नही चलने दिया...सभी न्यूज़ चैनल्स ने अपने प्राइम टाइम पर इसे खूब चलाया... खूब डिबेट्स की...मैडम ये बहुत बुरी असहिष्णुता थी...इसने मेरे फेवरेट शाहरुख और आमिर तक को डरा दिया था...इसकी वजह से वो लोग देश छोड़ने तक की बात करने लगे थे...
और मैडम अभी दो दिन पहले पश्चिम बंगाल के मालदा में एक आतंकवादी का विरोध कर रहे कुछ् शांतिप्रिय लोगों की भीड़ ने आसपास की सभी जगहों में मारपीट की...राह चलते लोगों को लूट लिया...दुकानों और मकानों को आग लगा दी..पुलिस पर पथराव किया...दौड़ा दौड़ाकर मारा...उनकी गाड़ियाँ जला दी...पर किसी नेता या पत्रकार ने इसकी सुध नही ली... किसी क्रांतिकारी न्यूज़ चैनल ने इसपर कोई डिबेट नही करवाई...किसी साहित्यकार ने अपना बहुमूल्य अवार्ड वापस नही किया...देश की संसद में भी इसपर कोई बवाल नही हुआ...किसी बॉलीवुड स्टार को इससे देश में कोई दिक्कत नही हुई...उनके बच्चों को भी बाहर निकलने में कोई डर नही लगा...इससे साबित होता है कि ये अच्छी असहिष्णुता है...इसने किसी को तंग नही किया...

टीचर- शाबाश अर्जुन बैठ जाओ..!!

" जिंदगी की महाभारत का हश्र बकाया है "

" मेरे सत्य और तुम्हारे सत्य में कितना अंतर है
अंतर ही होता कोई बात न थी 
यहाँ तो जिंदगी मौत का फासला है
मैं , मैं कहाँ हूँ
मैं, दम्भ ...झूठ में छिपा सत्य का मुलम्मा हूँ
सत्य की धार को कुंद करता शिफारिश का पुलिंदा हूँ
विश्वास नहीं होता गर
देखो डॉक्टरी जाँच में
देखो भटके इतिहासकारों की किताब में
देखो महाजनी काज में
देखो किसान के सूखे खेत में
देखो बहती नदी तट की रेत में
देखो मास्टरी मायाजाल में
देखो नेताओं की चाल में
देखो रिश्वतखोरी के माल में
देखो बिक्रीत कलम में
देखो बहकते सम्भलते कदम में
और सत्य मर रहा है
घुट रहा है
कराह रहा है
जिंदगी की महाभारत का हश्र बकाया है "
-
---------- विजयलक्ष्मी

" तिरंगा भरकर कलम में सारे जहाँ में फहरा दो"

" वही कलम झूठ की पाबन्द होती जो बिक चुकी होती है,,
कठपुतली किसी दौलतमंद के हाथो बन चुकी होती है,,
इतिहास को उजागर करती है शहंशाहों की गुलाम होकर
राणा प्रताप को त्याग बताती है अकबर क्यूँ महान था..
क्यूंकि मीना बाजार लगाता था ...या ख़ूबसूरती को नजर ....

जोधा से विवाह ये कैसा प्रेम था सियासी जजिया कर लगता था

राणा की आजादी जिसे रास नहीं आई ...
राणा वही राणा देशप्रेम में घास की रोटी तलक खायी..
एश औ आराम क्या कम थे ... जिन पूर्वजो ने धर्म न बदला..
उनपर सितम क्या कम थे ...जिन्हें वतन रहा प्यारा उन्हें आजादी की चाह,,
मणि शंकर अय्यर को देख लो दौलत औ सत्ता की राह ,
एक गोधरा को गाते है सभी ...
कितने मारे थे साबरमती के डिब्बे की आग में बताओ क्या बताते है कभी
इक अखलाख का रोना रोया खूबजमकर ,,
क्या हुआ काश्मीर ..मालदा औ पूर्णिया में मिडिया उस समय सोया जमकर
क्या जरूरत है भला एसी कलम की ,,,
खोले बैठी है मण्डी शहीदों के कफन की
रोना है गर हर बच्चे की भूख पर रोते
बांटते न धर्म की बिना पर ,,, आतंकवाद पर चुप नहीं होते
जयहिंद जयहिंद के नारे से गगन गूंजा दो
तिरंगा भरकर कलम में सारे जहाँ में फहरा दो"
------ विजयलक्ष्मी



" झूठ उगलते चौथे स्तम्भ की बात
दोगले हुए स्वार्थी औलाद की बात
मालदा में करें या पूर्णिया की बात
ईमान को मापे या असहिष्णु सौगात
बदलते पहलू की या प्यार जो बरबाद

मरती इंसानियत औ जहरीली बात
माँ को डायन कह खंजर घोंपती बात
आतंकी जनाजे के पीछे इंसाफ की बात
जहाँ दूष्मन के घर बैठ होती सत्ता की बात
वंदेमातरम जहाँ फतवों में दब गया
करो तुम भी उसी लकीर के फकीर की बात
या जिंदगी जिंदा होती है जहाँ मरकर
शहादत पर कसम उठती है जान देने की
आन पर मान पर प्राण देने की बात
कर सको गर करो हिंदुस्तान की बात "
--- विजयलक्ष्मी

" सरहद पर खड़े हर जवान को नमन है ,,"

हम चैन से सोते हैं तभीतक ..
जबतक सरहद पर खड़ा है इक इक सिपाही निगेहबानी करता है,,
जबतक लड़ता है बर्फीली हवाओ से सियाचिन की पहाड़ियों में ,,
जबतक खड़ा सहरा की तपती धूप आग उगलते सूरज के सामने
जबतक भीगता है बेमौसम बारिशों में होकर तरबतर
जबतक उठती है उसके मन में ज्वाल वतन की तुफाँ बनकर
जबतक सीने पर गोली खाने की आरजू डराती नहीं उसको
जबतक माँ की ममता सरहद तक पीछा करती है
जबतक सिंदूर सुहागन के हाथों में नहीं कंपकंपाता
जबतक बहना के हाथों की राखी से विश्वास नहीं मिट जाता
जबतक नन्हे बच्चे सेना की कसम उठाते हैं ..
जबतक पिता के सीने सेना का नाम से नहीं डर जाते
जबतक कुछ कर गुजरने चाहत में है
जबतक वतन पर मरमिटने की कुव्वत जेहन में है
जबतक शहीदों के किस्से बहते हैं लहू में
जबतक जिन्दगी को खिलौना बनाकर समर्पण की तमन्ना दिल में है
जबतक वेतन पर नहीं मुहब्बत ए वतन दिल पर तारी है
जबतक तिरंगे की शान जिन्दगी से ज्यादा प्यारी है
जबतक वतन की माटी सिंदूर पर भारी है
जबतक अहसास जिन्दा हैं ...
कभी कहकर देखो किसी नेता बने किस्मत के हेटे को
कोई तो भेजकर देखे कभी अपने भी बेटे को
कैसे धडकता है दिल पठानकोठ को सुनकर
कैसे फडकता है लहू कारगिल की चोट को धुनकर
सरहद पर खड़े हर जवान को नमन है ,,
उन्ही की बदौलत वतन वतन है और जिन्दा हम हैं
जयहिंद जयहिंद की सेना ||"
---- विजयलक्ष्मी


Friday, 1 January 2016

" नव कलैंडर वर्ष की शुभकामना |"





आप सबने कलैंडर बदल लिया होगा अपनी दीवार पर ...मुझे अभी बदलना बाकी है ....क्या करूं .... तारीख के साथ तिथियाँ भी चाहिए न.... और वो अभी तक नहीं लिया .. उलटे कुछ सवाल उठते गिरते रहे भीतर.......... कुछ औरों की वाल पर भी मिले..... सोचा आपसे भी शेयर करने चाहिए ..... सोचकर देखिये आप भी ...सम्भव है हम गलत सोच बैठे हो ..... पर दिमाग तो अपना कम करता ही रहता है न....

अब जरा पढिऐ HAPPY NEW YEAR हमारे साथ फिर दुबारा ( वास्तविक) मना लेना |
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1. ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन |

2. जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है इस बात पर भी गौर करें..


3 . सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है | ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और बारहवाँ महीना है ..


अब जरा संस्कृत की गिनती याद कीजिये .. सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept (सेप्ट) तथा oct (ओक्ट) कहा जाता है ...इसी से september तथा October बना ..नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के "नव" को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में "Dec" बन जाता है जिससे December बन गया .. इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था।
सोचिये .... 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
अब गौर कीजिये .... "X" रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..
अगर इन्ही बातों को ऐसे माने तो ----
कि अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..साल को 365 के बजाय 305 दिन का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..
लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..
भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।


इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़ अपना तारीख या दिन 12 बजे रात से बदल देते है ..
दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??
भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और हमारे यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है..


अर्थात करीब 5-5.30 के आस-पास और इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है। चूंकि वो भारत का प्रभाव था अत: अपना दिन भी भारतीयों से मिलाकर रखना चाहते थे ..इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..
हम क्या कर रहे हैं ....अनुसरणकर्ता का अनुसरण मतलब दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..
कुछ तो लोचा है कहीं न कहीं पर ...हमारा ज्ञान हमारे पोथी पत्रे ...सब उच्च कोटि के हैं |
खुद को पहचानों

🎉हम,,,"" भारत गुरु है .......और अन्य जन गुरु का अनुसरण करते हैं और करना भी चाहिए ...अपने नववर्ष का गौरव बढाइये .... आपका अपना भी गौरव बढ़ेगा | ""

" कलैंडर बदल रहा है ... 
कोरा सा सुंदर साफसुथरा ,,
खोलकर टांग दिया ,,
सूरज के साथ शुरू होगी कलम की रोशनाई ,,

मन की रौशनी में पढना ..

हर निशाँ जिन्दगी के कदमों का पता देता है ,,
कुछ चुपचाप से...कुछ चीख चीखकर सुनाते हैं ,,
कुछ कान बहरे हो चुके ,,
कुछ बहरे होने की तरफ उन्मुख है,,
जागो..नहीं तो पीढ़ियाँ खो जायेगीं ..जिंदगियां सो जाएगी ,,
और नया दिन नया बरस कैसे देखोगे बदलते हुए
और तुम्हे भी बधाई मन की गहराइयों से
आसमा के उस छोर पर टंगी है
चाँद के दामन में बिखरी चांदनी की आँखों की चमक में
बढकर थाम लो हर ख़ुशी"

 ---- विजयलक्ष्मी

" वो लम्हे हसीं थे जब साथ था ,,
वो लम्हे खूबसूरत रहेंगे जब जब साथ होगा ,,
वो लम्हे और भी लाजवाब होंगे जब हरसू अहसास होगा ..
और मोमबत्ती बन जला करूं ..

हर लम्हा हर पल ,,

रौशनी की जद्दोजहद में ,,
अँधेरा शाश्वत भी हो तो क्या ..
अभी हार नहीं मानी
नित्य रार नई ठानी
समझा इतनी ही है जिंदगानी"

 ---- विजयलक्ष्मी


"नये साल के दामन में ख़ुशी लिपटी मिले ,,
और आँख में चमकते सितारों से सपने ..
खिलखिलाकर मिले गले हरइक लम्हा ..
बस यही आरजू थी यही आरजू रहेगी ,,
नववर्ष मंगलमय हो ,",
--------- विजयलक्ष्मी





" कलैंडर टंगा है अभी भी उसी दीवार पर ,,
टंगा था एक बरस पहले जहां ..
याद दिलाता था भुलिबिसरी सी दास्ताँ
उसपर लगे स्याही के निशान बताते थे हमे
कुछ छुट्टियां दिखती बन बच्चो की ख़ुशी
प्रेस के कपड़ो का हिसाब ,,दूध की गिनती ..
अखबार की अनुपस्थिति कुछ जन्मदिन कुछ सालगिरह
जीवन पूरे कर चुके दादा जी की तिथियाँ
बीमार दादी की दवाई लाने की तारीख
चाचा चाची की शादी का दिन ,,
मुन्नी के स्कूल की छुट्टियां
पप्पू के आने में बचे दिन
बेटी के ब्याह के महीने ..
बुआ को राखी भेजने की याद कराने की तारीख
गैया के बियाने की सम्भावित तारीख़
नानी के घर जाने का हिसाब
नवरात्र शिवरात्रि दर्शाती होली और दीवाली
कभी गुरु गोविन्दसिंह की याद ,,
कभी ईद की छुट्टी का निशान ,,कभी गुरुग्रंथ साहिब की अकीदत
पडोस में होने वाली रामायण और सुखमणी जी का पाठ ..
कुछ आवश्यक फोननम्बर थामे टंगा रहा मुस्तैद
जाने अनजाने देखते पढते मिलने के पल
जुड़ गयी थी जैसे जिन्दगी हर पल
इसे भी बदलना होगा बदलती तारीख के साथ ,,
गुजरते साल से कलैंडर की तरह ही गुजरना है हमे भी
दादा मामा की तरह लिखी जाएगी मेरी भी तारीख
किसी को सुख देगी किसी को आंसू ..,,छोड़ जाएगी कुछ अहसास
साल दर साल बदलते कलैंडर पर ..
कुछ खो जाएँगी कुछ स्मृति चिन्ह सी चलती चलेंगी
साल का आखिरी दिन ..
और ..बदल जायेगा ये कलैंडर भी दीवार से
उसी कील पर नया कलैंडर ,,जैसे बदल रहा है वस्त्र समय भी
यादों के झरोखों से झाँकने को मजबूर करते लम्हे
गुजर रहे हैं एक एक कर आँखों की गली से होकर || "
------- विजयलक्ष्मी