Thursday, 18 December 2014

" मेरी वंश फसल में कल भी गीता रामायण ही विरासत होगी"

"अब पढ़ा जायेगा दर्द इबारत बनाकर 
फिर फैले होंगे हाथ इबादत बताकर 
फिर संगीने उगलेगी आग मेरे वतन की छाती पर 
कोई कोहराम यूँही देखेंगे सभी आदत बनाकर 
मोहताज लगने लगी दुनिया लहू की लहरों की 
रहेंगी यूँही रोएगे जबतक दहशतगर्दी को शाहदत बताकर
मर जाएगी इंसानियत सुबक कर देखा किये तमाशा
हथियार उठा खात्मे की गर नहीं इजाजत होगी
कभी मेरे हिन्दुस्तान की धरती लहू रंगती देख दुखी नहीं होते तुम
सोचकर देखना वही सूरतेहाल लिए सीरत की जलालत होगी
कुछ मासूम हुए शहीद तुम्हारी करनी पर ए जालिम
न सम्भल, जिन्दगी पनाह मांगेगी चमन में तेरे वो कौन हिमाकत होगी
जज्ब जज्बात इंसानियत के होते तो कुछ और बात रही होती
मेरी वंश फसल में कल भी गीता रामायण ही विरासत होगी"
---- विजयलक्ष्मी

Thursday, 11 December 2014

? मैं तुम्हे तुमसे ही मांग लू "

इस तरह अपनालो ,,
न जुदा रहूँ कभी ,
मुझे इस तरह डूबा लो 
न सूख पाऊ कभी 
स्नेहरस इतना बरसा दो 
सहरा न बन पाऊ कभी
शूल बनू या पुष्प
बस महका करू हर कहीं
जिन्दगी की साँझ भी सहर सी लगे जो
जुदाई का कोई लम्हा तो टूट जाऊ तभी
ह्रदय की थाप संगीत बन गूंजती हो सदा
मिलने ऐसे प्रेम तरसता मिले खुदा
देह का नेह न हो नेह नेह का हो रहे
दूर हम कहाँ ...साथ इसतरह रहे
हम एक हो दो देह जैसे ..तटनी तट मिले
रात अमावस या पुरनम ,,
चाँद लाजमी खिले
मुझे दरिया सा बहाकर ..कुछ कमल से खिले हो
पंखुरियां जैसे भाव मन में खिले हो
न रंज हो कोई ..
चाहे तकदीर सो रही हो
अपने साथ प्रेम की भोर हो रही हो
गम के नजारे बंद हो दर्द भी पुष्प सा खिले
रक्त में हो आन शान ...मान भी मिले
तुम खुदा ...कह दिया
तुम बुततराश हो ,,
तराश दो मुझे इस तरह की तू ही साथ हो
क्या माँगना किसी और से ...तुमसे ही मांग लू
छीन लो मुझे मुझ से ही ..मैं तुमसे तुम्हे ही मांग लू
मैं तुम्हे तुमसे ही मांग लू "
--- विजयलक्ष्मी

" मुझे ईश्वरत्व नहीं इंसानियत देना "

जीवन का प्रवाह 
न सन्यास न उच्छ्लन्खता 
न सियासतदारी है 
न रियासतदारी है 
न त्याग की गाथा ही उतारती है उस छोर 
न स्वार्थ की कामना 
न इश्वर से होने वाला सामना
न इश्वर तुल्य होने की इच्छा 
न कृष्ण न शिव होने की उत्कंठा 
न पर्वत सी पीर न समन्दर के तीर 
न दर्द सुमेरु बनने की 
न उत्कंठा आकंठ भरने की 
क्या करना महान बनू मैं बहुत 
न गणना पुष्पित डालो की 
न चिंता सांसारिक भालो की 
न उद्वेलित मन विरानो सा 
न चाहा बागों सा खिलना 
विरानो के काँटों में पुष्प बना 
घनी धुप में वृक्ष घना 
सहरा में बदली सा होकर बरस बरस बरसा दे मना 
जब रात अँधेरी चंदा सा चमकू 
चमक चांदनी रौशनी भर दू 
मुस्कान बना सूखे होठो की 
उलझे लट जख्मी आहटो की 
बन नदिया सा बहना सिखला दो 
मुझको थोडा पत्थर सा बना दो 
न राह अधूरी कुछ जीवन की मारामारी 
पर्वत पर बर्फ सा थोडा संघर्ष सा 
करता विमर्श सा 
नफरत को ताले में बंद रखना 
प्रेम की धारा को नदिया सा हौसला देना 
वृक्ष की खोखर में पंछी का घोसला बनेगा 
तिनका चिड़िया दाना ..
जाल पंख जीवन का खेला 
जिसको लेकर भी मन चले अकेला 
बन सन्यासी त्याग करू जमघट का 
लेकिन इच्छा हो वासी जैसे मरघट का 
कभी मिलना हो गर प्रभु से अपने 
लालसा मुझसे ज्यादा हो 
हर बार साथ का वादा हो 
जब बिछुडू नमी आँखों में 
इंतजार बातो में 
रास्ता कटे रातो में 
दिन याद में जिन्दगी के साथ में
मयूर से नाचते हो मन के जंगल में 
गुरबत हो या सत्ता न हैवानियत देना
मुझे ईश्वरत्व नहीं इंसानियत देना 
जीवन का प्रवाह 
न सन्यास न उच्छ्लन्खता 
न सियासतदारी है 
न रियासतदारी है 
न त्याग की गाथा ही उतारती है उस छोर 
क्षितिज के उस और मिलना 
जहां रिश्ते भी फरिश्ते से होकर आँखों में तिर जाते है --- विजयलक्ष्मी

Monday, 8 December 2014

" चुभन थी मीठी सी "

न 
मौन रहा मेरा 
न 
शब्द हुए मेरे
दर्द 
बिखरा सा  
किसी डाली पर जीवन-वृक्ष की
किसी डाली  
खुशबू खुशी की 
उडती सी 
मिलीं 
कहीं
 सिमटी हैं यादेँ 
कहीं 
अहसास बिखरे से 
कभी 
चोट फूलो से 
जख्म
 खारो के भले थे 
महकते तो थे 
चुभन 
थी मीठी सी 
तन्हा सा मौसम है 
तन्हाई में ,,
संवरे ....!! 
तो ..
क्यूँ संवरे ?"---- विजयलक्ष्मी

.जल्दी वर ढूंढो इसका ब्याह कराओ

बेटी ने घर में कदम रखा ..लगा 
जैसे.. बहार आ गयी आंगन में 
जैसे ..कलियाँ चटकी हो अभी अभी 
जैसे ..नव किसलय नव प्रभात का आगमन हुआ हो 
जैसे .. मोर नाच उठे हो जंगल में 
जैसे ..फूलो पर तितलियाँ थिरक उठी हो
जैसे ..भंवरे स्वागत राग गुजार उठे हो
जैसे ..बांस की पोरी को बांसुरी बना सरगम नाच उठी हो
जैसे ..आम के वृक्षों पर बोर ने मिठास हवा में बिखेरी हो
जैसे ..मन का मोर जंगल में मंगल कर उल्लासित हो
जैसे ..चंद्रमा मेरी गोदी में गगन से उतर आया हो
जैसे दग्ध धरा को पहली बरसात से मिली राहत तपती गर्मी से
जैसे ..कुंकुनाती धुप भोर की सर्दी के मौसम में
जैसे ..दीप जला हो पूजा का तुलसी के बिरवे पर
जैसे ..अभी परियां उतरी हो आंगन में मेरे
उल्लास चेहरे पर मन में रागिनी सी
माँ की जिन्दगी ..जीवन की संगिनी सी
इत्तेफाक से पीछे से एक पड़ोसन भी चली आई कुछ लम्हों के बाद
बोली ..बेटी सयानी हो गयी क्यूँ नहीं उठाती इसकी डोली
छन छन नाचता मन मयूर सहरा सा हो गया पलभर में
मेरी नाजुक सी सलोनी कैसे कब हुई इतनी बड़ी
मेरी आँखों ने क्यूँ नहीं देखा ..
मन घबराया ...नजरो ने तौला ...होठो ने बोला ..इतनी जल्दी ?
बोली पड़ोसन ..दुनिया खराब है .. जबतक दूर थी ..तुम भी मजबूर थी
समझो ..सयानी होती बेटी दुनिया की आँखों में चुभती है
हर आने जाने वाली की निगाहों में खुटती है
उम्र कम भी नहीं ...
बेटी नादान और कमसिन भी सही है
नादानी में न आओ ...जल्दी वर ढूंढो इसका ब्याह कराओ
अपनी नजरो से नहीं दुनिया की नजर का चश्मा पहनो देखो गर देख पाओ
जमाने की हवा खराब है
दुसरे पड़ोसी के बेटे का खाना खराब है
तीसरे वाले घर की बेटी के पीछे लफंगे पड़े हैं
जानती भी हो नुक्कड़ की पान वाली दूकान पर लडके क्यूँ खड़े हैं
मेरी जान धक करके रह गयी ..जितनी ख़ुशी थी सब काफूर हुई
मैं भी बेटी के ब्याह की फ़िक्र में चूर हुई
कोई लड़का नजर में हो बताना ...
ठीक कमाता हो थोडा सयाना हो
दहेज की हिम्मत नहीं है
लडकी पढ़ी लिखी है ..गृह कार्य में दक्ष है ,,
सुंदर है सलोनी है .,,
वो बोली ...दूल्हा बिकता है यहाँ तो ...सीधा बोलो कौनसा खरीदोगी
.-- विजयलक्ष्मी