Tuesday, 4 June 2013

सिसकियों में भी तन्हा कोई नहीं रोता

हर कदम जिन्दगी का बढ़ता रहे यूँ ही ,
सफल हो जिन्दगी हर कदम पर यूँ ही .- विजयलक्ष्मी

सोचने का वक्त ही नहीं है जिन्दगी की शाम का अभी 
अक्सर बादलों की ओट से भी सूरज आता नहीं नजर .- विजयलक्ष्मी

तुम्हारे भेजे हर खत को वो पढ़ता है खोलकर ,
मेरे दर्द बताकर अपने बैठा लेता है तुम्हे रोककर .- विजयलक्ष्मी

कुछ कर्म लेख है कुछ हाथ की लकीरें ,
सिसकियों में भी तन्हा कोई नहीं रोता .- विजयलक्ष्मी

बेबसी भी होंगी मजबूरियां भी होगी कुछ ,
जिन्दगी की धारा किसी से मुह नहीं मोडती.- विजयलक्ष्मी


कुछ दीप जलाए थे उम्मीद के हमने भी देहलीज पर ,
रहती है नजर हमेशा उसी छोर जिन्दगी की दहलीज पर .- विजयलक्ष्मी
 
उस रात का असर जिन्दगी भर रहना था 
जरूरी भी था असर का रहना ..भूख की मार ऐसी ही होती है 
वक्त बदल जाता है किन्तु अतीत नहीं भूला जाता 
न बचपन के बीते दिन न वो इन्तजार करती वक्त की पहेली सी जलती बुझती सी इंतजार की घड़ियाँ
वक्त को कभी हम ठेलते है कभी वक्त हमे ठेलता है 
नम आँखों के साथ बीतते वक्त को गुजारा है इन आँखों ने 
और सहर का इन्तजार किया कई बार ...
सूरज भी कभी कभी बहुत इन्तजार कराता सा लगता है 
कभी सुर टूटकर बिखरते है कभी सरगम गूंज जाती है सन्नाटों में
और कविता ...लहरा उठती है अपने आप धुप से चटकते आंगन में ..
कभी बिच्छु से दौड़ पड़ते है और रेंगते है शरीर पर जैसे मौत घूम जाती है ..परचम लिए
उस चौराहे पर गये हो कभी जहां भूख कड़ी रहती है नंगे पाँव ..
प्यास बहती है नदी की तरह दूर तलक ..कविता वहां भी बहती है ठहरती नहीं मगर..
मुझे दिखती है कविता उन आँखों में लालसा है जिनमे सरहद पर गये बेटे के लौटने की सही सलामत
मुझे दिखती है कविता उन मासूम चेहरों में भूख से बिलबिलाते है जो सूखी छाती से चिपक कर
मुझे दिखती है कविता उन सहमी आँखों में ख्वाब ठहरे है जिनमे भविष्य के
मुझे दिखती है कविता उस स्त्री की मांग में सूनापन लिए अथक चलती है जिन्दगी की तलाश में
मुझे दिखती है कविता उस जहन में जो ख्वाब बेचते है सुनहरे से संसार के रंगीले
मुझे दिखती है कविता उस रिक्शे की चूँ चूँ में रोटी की कीमत में साँझ प्रहर की
मुझे दिखती है कविता उस बच्चे की लाचारी में जो जूते गांठता है सहर से साँझ तक
मुझे दिखती है कविता उस किसान के हल में जो भरी दोपहरी तपता है मिटटी के संग
मुझे दिखती है कविता उस मासूमियत में जो कूड़े के ढेर में जिन्दगी बीनते है हर वक्त
मुझे दिखती है कविता उस चेहरे में जो सहम जाता है किसी नजर को अपनी और उठता हुआ देखकर
मुझे दिखती है कविता उस चंदा में रोटी सी शक्ल लिए दीखता है ख्वाबा सा भूखा हो जैसे कोई
मुझे दिखती है कविता उस जंगल में दावानल से चीख रहे है पंछी और बसेरे जलते है है पशुओं के
मुझे दिखती है कविता उस चीख में जो सहमकर बैठी है आंगन के भीतर तन के पुजारियों से डर के
मुझे दिखती है कविता हर उस दर्द में जिससे घायल है इन्सान और मरता है सांसों सांसों में
हर कदम जब ठिकर से चीत्कार उठे सुर होता है कविता का
मेरे हृदय में द्रवित हुए सोतों में कविता बजती है प्रतिपल
जीवन की जलती सडक पर तपती देह चमककर दिखती है सोना तब उगती है कविता
चेहरे की झुर्रिया सुनती है कविता जीवन की चीख चीखकर हे कोने में मन के
राग बजता है स्नेह के धागों का जब ममता दुलराती है नन्हे छौने को
कोई मखमली ख्वाब कोई लाता है एक स्मित सूखे होठों पर कविता बन जाती है
सुख दुःख की नदिया के तीरे जब कोई गीत कर्म की रेख लिखी जीती है जीवन की धारा
बहती है असुवन में कविता सी छलक कर निर्मल धारा
और पवन की अठखेली अलबेली उस राह पर तोडती पत्थर कोई सहेली अलबेली
खेत खलिहान में कुदाल की धार और राहत की आवाजें गति है कविता ही
रक्तरंजित कदम जब उठकर चलते है दुल्हन से महावर लगाये गूंजती है कविता सी हुक कही कोने में
जीवन का हर लम्हा कविता कह जाता है सुनकर देखो
प्रेमप्रीत की जीत तभी दुःख में सम्बल और मधुर मुस्कान खिले
वक्त की बहती धारा में कश्ती बन जब जीवन सा साथ चले
और रागिनी बजती है मद्दम सुर में रुबाइयों सी अलबेली ठहर ठहरकर मेरे भी भीतर
भावों के धागे जब बुनती है जीवन की रेल और धडकती है आँखों में तेरी अपनेपन की महक ..
और अंचल में छाँव धुप संग चलती है कदमों के संग ...कविता कह दूं या राग गीत
या एक बीतराग मेरे जीवन का ...बहता है झरना सा झर झर..जीवन का
.- विजयलक्ष्मी

समन्दर सी मैं ....चाहकर भी प्यासी हूँ खारे जल में

जब कलम चले तो नमी आँखों में आ जाये अपनी उस अहसासों से ,
चलता है कविता सा जीवन मद्दम से उठते गिरते अंतर्मन के प्रयासों से 
गीत बनते है दर्द के दर्दीले से उठकर सांसों से 
जब बरसता है सावन आँखों से रिमझिम 
और रागिनी गाती है मद्दम सा सुर झंकृत होकर मन वीणा पर 
जब बीतराग सा कदम चल पड़े आहत सा आहट पाकर 
चटक धुप जब सुखा देती है जीवन की छाया 
और बेलाग लिपटता है दुर्दिन सा साया 
बहते है सुर मन के भीतर ही रिसकर 
और सजीले गीत रूठकर होठों से बहते है हवाओं में सुर लहरी से
गाती है प्रीत कहीं अंतर्मन में तड़प रागिनी तेरे मन की
और सुनाई देती है जर्जर सी आवाज कही कुए से आती
और डूबकर सूरज फिर लड़ता है खुद से
ढूंढता है उस उजाले को अंतर्मन के आने वाली सहर पर लुटाना है जिसे
और समन्दर सी मैं ....चाहकर भी प्यासी हूँ खारे जल में
उठते गिरते भावों की लहरों पर सवार किश्ती में बैठे तुम ..
और एकाकी सी एकाकी पल में संग तुम्हारे जीती हूँ प्रतिपल
ओ जिन्दगी !क्या तुम ही हो संग मेरे ?
पहचान हो गयी हो तो बता देना.....!
इस छोर पर हाँ ...मैं ही हूँ
.- विजयलक्ष्मी

चटकता है कली सा बहकता है शबाब बनकर.


















आशा का बीज अब निकला है पौधा बनकर ,

खिल रहा है आंगन में मेरे आफताब बनकर 

महकता है पल पल ,,चहकता है झरोखे पर 
बहकता है हवा संग ,लहकता ख्वाब बनकर.

सुर्खरू है रंग देखकर मेरे महताब का यूँ भी
चटकता है कली सा बहकता है शबाब बनकर.

डराता है सायों के रंग से..कालिमा का खौफ दे
डरता है सरगम से रहता है खुद गजल बनकर
.- विजयलक्ष्मी

दर्द से वाकिफ हैं एक दुसरे के मगर चुप है

तुम सामने न आओ तो क्या सामने नहीं हो ,
तुम भी जानते हो जानता है दिल तुम यही हो .
इस हकीकत से तुम कब तलक मुख मोड़ोगे
हम यही है आइना भी है और तुम भी यही हो .
दर्द से वाकिफ हैं एक दुसरे के मगर चुप है 
तुम्हे मुझपे यकीं है तुम भी तो मेरा यकीं हो
.- विजयलक्ष्मी