Wednesday, 3 May 2017

" हम तो अपनी मुफलिसी में रमजान मना लेते हैं ,

" हम तो अपनी मुफलिसी में रमजान मना लेते हैं ,
सजदे भी अता करते हैं , रब का नाम भी लेते हैं || "
 --------- विजयलक्ष्मी

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" मरहम की जरूरत जिन्हें हो उन्हें जख्म न देना प्रभु ,,
मेरे जख्म नासूर बनादे, जिन्दगी से मुलाकात तो होगी || "  --- विजयलक्ष्मी



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मुझसे मेरा पता खो गया है ,,
पुराना निशाँ वो दर्द दे गया है 
भीगाकर हमे खुद सो गया है 
खुश्क मौसम रंग जर्द दे गया है 
खामोश सी आवाज बो गया है 

कलम को शब्द कमजर्फ दे गया है ||
---- विजयलक्ष्मी

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