Sunday, 26 June 2016

" महंगाई महंगाई की चीख पुकार पड़ी है चारो तरफ "

" महंगाई महंगाई की चीख पुकार पड़ी है चारो तरफ ...आलू बीस से पच्चीस हुआ और शोर शुरू ...........चालीस पर तो अफरातफरी मच जाती है ........ टमाटर साठ से अस्सी और सौ रूपये किलो की अफवाह उडी ...मेरे शहर में कल चालीस रूपये किलो ही बिका ..... ..महंगाई का रोना सब्जी दाल आटे तक की सिमित क्यूँ है .........ये बात समझ नहीं आई ......... अरे ब्रांड के कपड़े देखो कितने महंगे है .........जो शर्ट कपड़ा लेकर सिलवाने में चारसौ रूपये की पड़ेगी उसे दौ हजार में खरीदकर ख़ुशी से पहनते है ...और सोचते है स्टेटस बढ़ गया ..... एक घर में तीन गाड़ियाँ होसकती हैं .......सोफा एक लाख रूपये का आ सकता है ............क्रोकरी दस हजार का डिनर सेट आ सकता है ...........साडी पञ्चहजार की पहनेंगे...क्रीम दो दो हजार की इस्तेमाल हो सकती हैं ....... लेकिन आलू दस रूपये किलो ही चाहिए ........उससे ज्यादा कीमत तो सरकार बदल दो ......... उसपर तुर्रा ये किसान क्यूँ मर रहा है ........... फांसी लगाकर ........लगाएगा ही फांसी क्यूंकि तुम लोग ही सब उसके जिम्मेदार इसके लिए ...........बंद करदो ब्रांड की दूकान क्यूँ खरीदते हो .......कोल्डड्रिंक नींबू-पानी पियो न ...किसान को मिले कीमत ....... सरकार के खिलाफ लामबंदी करनी है तो उन के खिलाफत में करो जो जो माल को दबाकर बैठे हैं .......जो किसान को रोटी को तरसा रहे हैं ........ सरकार को कहो किसान से सीधा खरीदे ....और सबलोग उसी दुकान से खरीदे जहाँ से किसान को सीधा लाभ मिलता हो .....अजी क्यूँ लेकिन .........सब्जी भी मॉल से खरीदेंगे ,,,,,,,ठेली वाला तो सब्जी में जहर मिलाता है जैसे .......अरे अछूत जैसा व्यवहार करते हो और गाली सरकार को देते हो ........ कहो सरकार से महंगा खा सकते हैं ...लेकिन शर्त यही ..लाभ बिचौलियों को नहीं किसान को मिले ......... जगाइए अपने जमीर को हिन्दुस्तानी खाने की तरफ लौटिये ......... हफ्तों पहले बने पिज्जा ...महीनों पुरानी तैयार पैक्ड सब्जियां क्यूँ ........ ओह किट्टी जाना है .......अरे तो जाइये न लेकिन बच्चे को कुछ संस्कार भी सिखाइए ......अन्यथा बिगडती पीढ़ी की जिम्मेदारी भी आपकी है और अन्नदाता का भूखे पेट फांसी लगाने में भी हिस्सेदारी है आपकी ........... राष्ट्र जागरण से सरकार को कोसने से पहले अपने गिरेबान में तो झांकिए ........ आप किसे बढ़ावा दे रहे हैं ..........किसानो की जिन्दगी की तरक्की को या दलालों की मुनाफाखोरी को .........आपको ही सोचना है .....क्यूंकि धरतीपुत्र किसान के सुख में ही हमारा-आपका सुख निहित है दलालो के हित में नहीं उसकी तिजोरी भरती रहेगी .......... आप चीखते रहेंगे .......सरकारे बदलते रहेंगे ...... लेकिन सरकार से अपने दिए टैक्स का हिसाब भी लीजिये ......... न हो सब्सिडी में बांटकर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाये और जिस विकास के नाम पैसा दिया ........ वो समय से पहले जर्जरहोकर नेस्तनाबूत हो जाये ..... सोचिये ....सोचिये ,,,आँखे खोलकर बंदकर के उलटे लटक कर सीचे भटक कर ..........लेकिन सोचिये जरूर ...ये रास्ता भी हमे ही खोजना होगा ||
अंतर्राष्ट्रीय पटल पर खड़ा भारत उसके नागरिको केकारण औंधे मुहं नहीं गिरना चाहिए ...स्वस्थ रहने के लिए दाल के प्रोटीन की आवश्यकता होती है मुनाफाखोर दलालो औ आढ़तिए की नहीं ,, वैसे आप खुद बहुत समझदार हैं
| "-------विजयलक्ष्मी

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