Wednesday, 28 June 2017

" इसे कहते हैं राजनैतिक लोचा "

इसे कहते हैं राजनैतिक लोचा ---
'जै बीम' वाले अंबेडकर जी ने एक ब्राह्मण महिला से शादी की,
लेकिन वो ब्राह्मण नहीं हुये, बल्कि उनकी पत्नी ही दलित हो गई....
मीरा कुमार ने ब्राह्मण पुरुष से शादी की
लेकिन वे दलित की दलित ही रहीं,
ब्राह्मण नहीं हुईं.
समझने के लिए सारे योग उपयोग कर लिए... दिमाग की दही बन गयी लेकिन कोई गणित काम नहीं आया ||
ये कौन सा हिसाब है ?
या तो मीराकुमार दलित नहीं या फिर # जै_बीम अंबेडकर दलित नहीं.
या तो चतुर बोलो या फिर घोड़ा,
ये घोडा चतुर.. घोडा चतुर....क्या रे????


Tuesday, 20 June 2017

तुम ..तुम तो शुरू से ही अवांछित हो ,

सत्य दर्शन :--
ए खुदा मेरे
हर दुआ बद्दुआ बनती जा रही है
नहीं ...तुमने तो दुआ ही दी थी 

खराबी तेरी आत्मा में है ..सड़ गयी है बदबू है उसमे दुर्गन्धयुक्त हो चुकी है
किसी लायक नहीं बची ,,
अब इसका मिटना ही ठीक है ..खत्म होना अच्छा
रेंगते कीड़े बीमारी फैलाते हैं दुनियाभर की
और आतंकित रहती है दुनिया खौफ से
तुम्हारे खौफ से खुदा आतंकित रहने लगा है
जानते हो तुम ..इसी लिए कपाट बंद है तुम्हारे लिए
अपवित्र लोगो के मन्दिर में घुसने पर बंदिश होती है
पवित्र आत्माओ के साथ ही कोई शरीर प्रभु चरण वन्दना का हकदार होता है ,
तुम ..तुम तो शुरू से ही अवांछित हो ,
ए नारी तुम पतिता हो !
तुम्हारा पता क्या है ?
तुम्हारा पति कौन है ?
तुम्हे अधिकार दिया किसने ...स्वयम छीन लेना चाहती हो
तुम अछूत हो ..निकलो बाहर .....और इधर नजर तो क्या पैर करके भी मत सोना
प्रभु गंदे हो जायेंगे ..
अपमानित करती हो तुम ..
बहुत ताज्जुब हुआ था पहली बार ..जब नाम सुना था अपना ,,
कितना खुश थी न ...सिर्फ इस अहसास से ,कुछ तो वजूद है मेरा भी ,
लेकिन ...गंदे लोगो का वजूद नहीं होता ..वो भार स्वरूप होते हैं धरा पर
उनके लिए दया, प्रेम ,अधिकार, दोस्ती ,ईमान सब बेमानी है ,,
तुमपर इल्जाम है ...और भगवान कभी गलत नहीं होता ,
हमारी तुच्छ बुद्धि क्या समझेगी किसी परम तत्व को
अज्ञानी अधम ,हम प्रभु लीला को क्या जानेंगे ..
बस अनुगामी हो सकते हैं ...अधिकारी न होने पर देखना ..किन्तु
वो भी न होने पर एकाकी रहना ..अहिल्या बनकर
और इंतजार किसी राम का ,,
जो सम्भव नहीं है ..क्यूंकि ..
राम कलयुग में जन्म नहीं लेंगे ..
अब तुम्हे पुनर्जन्म लेना होगा .
और ये जन्म यूँही काटना होगा
परिष्कृत करना होगा ,,खुद को ..
जो सम्भव नहीं है इस जन्म में तो ..
तीन युग ...फिर राम का जन्म होगा ...और तब सम्भव है उद्धार तुम्हारा
यदि युग न बदला ?
यदि राम न आये ?
यदि एसा जन्म न मिला ?
तो ............
!!-- विजयलक्ष्मी

" दिल्ली का लालकोट "या ..............||

इतिहास जिसे इतिहास कर दिया और बदल दिया अँधेरे में ,, हमारे वास्तविक इतिहास के सूरज को अमावस्य कर दिया और विदेशियों के इतिहास को गले से लगा लिया ..नहीं जानते क्यूँ ..साक्ष्य बदले वास्तविकता बदली और न जाने क्या क्या .....लेकिन क्यूँ ?समझ से परे है .. आइये एक और ताला खोलते है आज ... राजधानी दिल्ली की जानीमानी इमारत का ...
" दिल्ली का लालकिला......या लाल कोट "


हमें पढाया जाता है कि दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ ने बनवाया था| लेकिन यह एक सफ़ेद झूठ है और दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ के जन्म से सैकड़ों साल पहले "महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय" द्वारा दिल्ली को बसाने के क्रम में ही बनाया गया था| महाराज अनंगपाल तोमर और कोई नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे| इतिहास के अनुसार लाल किला का असली नाम "लाल कोट" है, जिसे महाराज अनंगपाल द्वितीय द्वारा सन 1060 ईस्वी में दिल्ली शहर को बसाने के क्रम में ही बनवाया गया था जबकि शाहजहाँ का जन्म ही उसके सैकड़ों वर्ष बाद 1592 ईस्वी में हुआ है| दरअसल शाहजहाँ ने इसे बसाया नहीं बल्कि पूरी तरह से नष्ट करने की असफल कोशिश की थी ताकि, वो उसके द्वारा बनाया साबित हो सके लेकिन सच सामने आ ही जाता है| इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि तारीखे फिरोजशाही के पृष्ट संख्या 160 (ग्रन्थ ३) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) कि ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया| सिर्फ इतना ही नहीं अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात के वर्णन हैं कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और आलिशान दिल्ली का निर्माण करवाया था| शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले ही 1398 ईस्वी में एक अन्य लंगड़ा जेहादी तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया हुआ है (जो कि शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जाती है)| यहाँ तक कि लाल किले के एक खास महल मे सुअर (वराह) के मुँह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं क्या ये शाहजहाँ के इस्लाम का प्रतीक चिन्ह है या हिंदुत्व के प्रमाण? साथ ही किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है क्योंकि राजपूत राजा गजो (हाथियों) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे जबकि इस्लाम जीवित प्राणी के मूर्ति का विरोध करता है| साथ ही लालकिला के दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से एक कुंड भी बना हुआ है जिसके फर्श पर हिंदुओं मे पूज्य कमल पुष्प अंकित है| साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि केसर कुंड एक हिंदू शब्दावली है जो कि हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरे स्नान कुंड के लिए प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होती रही है| मजेदार बात यह है कि मुस्लिमों के प्रिय गुंबद या मीनार का कोई अस्तित्व तक नही है लालकिला के दीवानेखास और दीवानेआम मे| इतना ही नहीं दीवानेखास के ही निकट राज की न्याय तुला अंकित है जो अपनी प्रजा मे से 99 % भाग (हिन्दुओं) को नीच समझने वाला मुगल कभी भी न्याय तुला की कल्पना भी नही कर सकता जबकि, ब्राह्मणों द्वारा उपदेशित राजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्द है| दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 ईस्वी के अंबर के भीतरी महल (आमेर/पुराना जयपुर) से मिलती है जो कि राजपूताना शैली मे बना हुई है| आज भी लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने हुए देवालय हैं जिनमे से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकार मंदिर है और, दोनो ही गैर मुस्लिम है जो कि शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं के बनवाए हुए है| इन सब से भी सबसे बड़ा प्रमाण और सामान्य ज्ञान की बात यही है कि लाल किले का मुख्य बाजार चाँदनी चौक केवल हिंदुओं से घिरा हुआ है और, समस्त पुरानी दिल्ली मे अधिकतर आबादी हिंदुओं की ही है साथ ही सनलिष्ट और घुमावदार शैली के मकान भी हिंदू शैली के ही है सोचने वाली बात है कि क्या शाहजहाँ जैसा धर्मांध व्यक्ति अपने किले के आसपास अरबी, फ़ारसी, तुर्क, अफ़गानी के बजाए हम हिंदुओं के लिए हिन्दू शैली में मकान बनवा कर हमको अपने पास बसाता? और फिर शाहजहाँ या एक भी इस्लामी शिलालेख मे लाल किले का वर्णन तक नही है| "गर फ़िरदौस बरुरुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता" - अर्थात इस धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यही है, यही है, यही है| केवल इस अनाम शिलालेख के आधार पर लालकिले को शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया करार दिया गया है जबकि किसी अनाम शिलालेख के आधार पर कभी भी किसी को किसी भवन का निर्माणकर्ता नहीं बताया जा सकता और ना ही ऐसे शिलालेख किसी के निर्माणकर्ता होने का सबूत ही देते हैं जबकि, लालकिले को एक हिन्दू प्रासाद साबित करने के लिए आज भी हजारों साक्ष्य मौजूद हैं| यहाँ तक कि लालकिले से सम्बंधित बहुत सारे साक्ष्य पृथ्वीराज रासो से मिलते है| इसके सैकड़ों प्रमाण हैं कि लाल किला वैदिक नीती से बनी इमारत है !!

Wednesday, 14 June 2017

"इक स्मितरेखा उभर आई होठो पर ..

स्थिर हुए भीगते हैं ,भीतर औ बाहर ..
आँखों पर अहम का पर्दा नहीं चढ़ता 
कलम से उतरे शब्द पढ़े हर किसी ने 
लहरों में उठा तुफाँ कोई नहीं पढ़ता 
फसल की कीमत भी जेब को देखकर 
हरियाली जरूरी, धूप कोई नहीं पढ़ता ||
--- विजयलक्ष्मी






"इक स्मितरेखा उभर आई होठो पर ..
सुबह की धूप जैसी ,
हर नाराजगी को याद करके गहराई और भी .
हर शब्द तुम्हारा अजब सी ताजगी देता है
टकराकर लहू मेरा मुझमे ..मेरा न रहे 
साँस मुस्कुराती है तपकर
तुम तूफ़ान सा टकराने की ख्वाहिश लिए
तेरे जज्बात का दीपक जलता है ..
तुम्हे रास नहीं तो बुझा दो आकर
यूँ तो तुम्हारी तमन्ना होकर भी नहीं
श्यामपट पर लिखी तहरीर झूठी लगती है तुम्हारी तरह
तुम्हारी आँखों में बसी है हकीकत
अहसास मेरे हैं ,
ख्वाब तुम्हारे भी शामिल है उनमे
जो न टूटने देते हैं न रूठने मुझको
सुनो ...
बहुत दिन हो गये न ..
तुमने मनाया भी नहीं " ||
.--- विजयलक्ष्मी





कुछ समय की खलिश है कुछ बेरहम है सिलसिला ,,
भीगे कितने किससे कहे ,, अहसास का ये काफिला 
कश्ती है मझधार अपनी उसपर भी टूटी पतवार है 
झूठ की बारात देखी औ सच दरकिनार ही बैठा मिला || ------ विजयलक्ष्मी






ए दिल ठहर 
यूँ न मचल
हर सांस पर
यूँ न बदल
अंजान सफ़र
वक्त का दखल
कैसी ये डगर
पहेली हर पल
तू न यूँ बिखर
समेटता चल
खुद से बेखबर
बढ़ता ही चल ।।
--- विजयलक्ष्मी





नीले छोर पर बैठा इक तारा तन्हा सा ,,
ढूंढता है रकीब बदलते मौसम सी फितरत लिए ||
इक जाल फेंकता है मछलियों के सलीब को 
एहतिमाल में नदी की समन्दर से रुखसत लिए ||
नजर नजर का फर्क नजर में ठहरा दिखा 

सुना वो खत लिए बैठे थे , ऐसे मिल्कियत लिए ||
-------- विजयलक्ष्मी



आओ बुलंद आवाज में वन्देमातरम उचारी जाए

चलो थोड़ी धज्जियां ईमान की उखाड़ी जाए ,
थोड़ी सी खपच्चियाँ छान की उतारी जाए 
बहुत गरज रहा है वो थोथे चने के जैसा 
चलो तो क्यूँ न हवा पाकिस्तान की निकाली जाये
दे रहे हैं सीख ..अपने घर में झांककर देखते नहीं है जो 
आओ बुलंद आवाज में वन्देमातरम उचारी जाए
मौत से डरते तो ईमान से मौन साध लेते
श्यामपट से वतन परस्ती की भाषा सिखा दी जाए
खोलकर आँख आज केसत्य से नजर मिलाओ
आगे बढो ,,एक बनकर नाक में नकेल डाली जाये
कश्मीर हमारा हिस्सा सुनो कान खोलकर
जिन्हें सुनाई नहीं दिया कान में गर्म तेल डाली जाये   ||
 ------------ विजयलक्ष्मी