Sunday, 16 February 2014

" चंद मुट्ठीभर लोग हैं कब्जाए दुनिया "

लिए पैरहन तन की भूख उदर की 

माप दी कदमों ने ये राहे किधर की .

इरादों में बंधा हुआ कर्म का लेखा 


मुस्कुरा लेते है देख धोखा जिधर भी 

मुसलसल वक्त हुजुर ने तोहफा दिया 


चाँद रोटी सा सूरज अंगार रखकर ही 

किसे कहा जाये स्वर्णिम अतीत यारों 


बीता ठेका शहंशाहों से गुजरकर ही

जैसे चाहा मरोड़ा जैसे सोचा तोडा था 


कानून भी, फैसला भी हूँ मैं हुनर भी

चंद मुट्ठीभर लोग हैं कब्जाए दुनिया


उठालो इरादे गर वो चलेंगे भापकर ही

उठालो सख्ती से मुट्ठी वोट जब मांगे 


पूछो हिसाब गली में आता देखकर जी .-- विजयलक्ष्मी 

Saturday, 15 February 2014

"बंदूक की गोली कनपटी पर रखता क्या है"

वक्त की ओर मुडकर देखता क्या है 

ये बता वक्त तेरे हाथ में रखता क्या है 



ये गरीबी के नजारे आंख में मोती दिए 


हुयी जीभ कसैली भूख से चखता क्या है 



क्या दिया है आज की पीढ़ी को इनाम 


दिखावा क्यूँ बता भीतर दहकता क्या है 



वासना की आग का मंजर लुटती आबरू 


पैरहन देह की कहाँ चरित्र रखता क्या है 



आत्मा की प्यास ही समन्दर पी सकेगी 


खौलता अहसास लहू में आंच रखता क्या है 



बिखरे हुए युवा लहू को सिमटना क्यूँ 


पाकीजगी से आत्मा तक रखता क्या है 



शब्द शब्द अंगार बन उड़ेगा नहीं गर 


पूछना होगा कलम में तू रखता क्या है 



इन्सान की कीमत अगरचे चंद सिक्के हैं 


बंदूक की गोली कनपटी पर रखता क्या है - विजयलक्ष्मी 

Thursday, 13 February 2014

"हमने तो अपना वसंत मना लिया "

एक दर्द हिस्से में आया 
पी लिया 


एक जख्म आकर टकराया 
सह लिया 


अँधेरा बढ़ गया जब जब 
मन बाती बना लिया 


पीली सरसों के फूलो से लेकर
मुस्कुराहट को सजा लिया 


मन पतंग को
अहसास की डोर से उड़ा लिया 


इस तरह ...

हमने तो अपना वसंत मना लिया
और ...तुमने ..? -- विजयलक्ष्मी 




"दर्द जब बहने रहने 

साथ में रहने लगे 


जिन्दगी बन जाये दास्ताँ..


कोई न बाकी रहे रास्ता ..


तन्हाइयों का हाथ पकड़ा 


और ..


चल दिए उस छोर 


जहां तन्हा दिया छोड़ 

,
और ..कर गुजरे वही ...


जिसकी आस न थी 


बाकी समन्दर सी प्यास थी ,,


और हम ......दूर तलक ..


अहसास के तार पर लटके हुए 


अकेले "......विजयलक्ष्मी 

Wednesday, 12 February 2014

" हमसफर तो साथ चला करते हैं "

सुनके गम मेरा जो हंसा करते है ,

बात बात पर तंज कसा करते हैं .






















गुलों की तारीफ करते हैं सभी 

भूले क्यूँ संग कांटे भी बसा करते हैं 




पुरवाई भी चलती छुरी की माफिक 


लम्हे तन्हाई में जब कटा करते हैं



इन्तजार कभी हमको कभी तुमको 


लम्हात ए वफा साथ चला करते हैं 



जिस्म औ रूह की बात नहीं है 


हमसफर तो साथ चला करते हैं .-- विजयलक्ष्मी 

जीवन संघर्ष है

नेह बरसा
बयार बसंती सी 
मन बिहसा 

खिल खिलाती 
मुस्काती है जिन्दगी 
साथ हो तुम्ही .

रास्ता चला था 
झरना मंथर सा 
मंजिल जहाँ

पुष्पित पुष्प
पल्लवित लतायें
जीवन संग

हरित मन
चपल चंचल सा
मन तरंग

शिकायत है
रवायत कैसी हैं
इनायत है

घुटन क्यूँ हैं
मन तरसा क्यूँ है
रुदन क्यूँ है

राजनीति है
जीवन संघर्ष है
परिणति है ...- विजयलक्ष्मी