Friday, 25 October 2013

जमीं पे उतर के मिल..

दर्द ए बयार न देख अब झोकें सा मिल ,
काँटें बहुत है चमन में तू गुलों सा खिल .

रंग ए झिलमिल सी ख़ूबसूरती नजर में ,
वो बुत संगमरमरी से, किरदारों से मिल. 

न आंसूं बहे ,न रुके ही पलक पर ढलके ,
डूबते उतरते नजर के सितारों से मिल .

इन्तजार ए वफा तो आज भी है मगर,
सूरज के बाद छिटके,न अंधेरों से मिल .

सितारा गगन का फलक पर बसा है अब ,
मिलना है तो सुन , जमीं पे उतर के मिल....
.विजयलक्ष्मी 

Saturday, 19 October 2013

शरद पूर्णिमा


शरद पूर्णिमा 
सम्पूर्ण प्रेम 
पावन अवसर 
मन 
बना है ब्रजधाम 
राधा के अराध्य 

मनमोहन
हे घनकेशी
हे घनश्याम
आ जाओ इस याम
खिला चन्दमा
सोलह कलाओ संग
रस बरसाओ मन आंगन में
और रचाओ रास
गोपी मन
करे पुकार
बजा बांसुरी
मधुर मनोरम
यमुना तट का करो श्रृंगार
महिमा अपरम्पार
सांवरे
अब तो दर्श दिखाओ
नैनो में तस्वीर बसी
मन वीणा पर सरगम गूंजे
चातक बन करें पुकार
अब सम्मुख आ जाओ
मेरे
कृष्णमुरार
मन मन्दिर को
पावन
कर जाओ एकबार .-- विजयलक्ष्मी




चाँद चल ही दिया आखिर





चाँद चल ही दिया आखिर
कितने ख्वाब रुके थे उसकी पलको पर 
वक्त वक्री गति लेकर गुजरा और इन्तजार और भी लम्बा हो गया 
जानती हूँ तारो की छाँव में ओस से मोती समेटे होंगे तुमने भी 
कुछ याद बाक़ी है अभी शेष 
दीखते अवशेष हैं शिकस्ता हुए सहर के खण्डहर पर 
कुछ हिचकियाँ भेजी जो तुमने सम्भाल कर रखली बंधकर खुद में 
खोलेंगे उन्हें फुर्सत के लम्हों में ...दिन दोपहर जब ख्वाब सब खो चुके होंगे 
तारे नींद की आगोश में सो चुके होंगे ...जुगनू से अहसास चमकते होंगे
इतिहास दोहराता है खुद को हमने सुना था ...
फिर लौटता क्यूँ नहीं वक्त वो पहला सा
जब लहर लहर उन्माद सा था और ख्वाब जगाते थे तुम्हे वतन के नाम पर 

कैक्टस के कांटे भी महकते रहे थे उसूल सा
और बिफरते थे तुम किसी नेता की खोखली सी बात पर
सोचती रही खत लिखूं तुमको ...मगर नहीं लिखा
क्यूँ लिखूं ...और क्या लिखूं ..बताओ ..
तुम कभी बताते ही नहीं खत मिला भी या नहीं ...
हां ..डाकिये से चर्चा हुयी थी कल भी तुम्हारी और वो भी हंसकर टाल गया
नहीं मालूम ये इंतजार अभी और कितना है बाकी
आँखों ने देखा होगा नजारा ...कान बेजार क्यूँ होने लगे हैं आजकल
कदम ठहर से जाते है बढ़ते बढ़ते ..क्योकि तुम रोक देते हो हमेशा
गहमी सी सुबह है लेकिन सूरज अभी दिखा नहीं ...बादल गहरे हैं .--- विजयलक्ष्मी

Sunday, 13 October 2013

उठती है हुक छितरा जाती है ख़ुशी की घड़ियाँ ,


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उठती है हुक छितरा जाती है ख़ुशी की घड़ियाँ ,


घूमते है चलचित्र नजर में शब्द कम बयाँ को लड़ियाँ 

माओ की फटी धोती से तन दहकती है दस साल की बेटी 

व्ही साडी जिसे ठकुराइन ने पर के बरस दी थी पोता होने ख़ुशी में

बर्तन घिसते हुए पीतल के ...

चूल्हे की राख से हथेली की लकीरे घिसने लगी थी उसकी

किस्मत तो देखिये ...भगवान को भी दया नहीं उसपर 

जंगल से बीनते हुए मरद को कीड़े ने काट खाया ...बेटा मर गया बीमारी से 

अब भरती है पेट बर्तन मांजकर खुद का और बेटी का लाचारी से 

एक गैया थी .छोटी ..बछिया सी सलोनी ..उठाकर लेगया महाजन ..अनाज के बदले में ...

बेटी भी लगती है रोज बढती है दुगुनी होकर 

डर लगने लगा है घर से निकलना बंद करूं सोचती है ...

साहूकार की नजर से गुजरकर ..-- विजयलक्ष्मी

अगर दिल दिया होता ...



अगर दिल दिया होता और तुम मिल गये होते 

वक्त का आलम ऐसा न होता गुल खिल गये होते 

महक उठती सुबह शाम हमारी यूँ न रो रहे होते 
जो दीवाना कह गये अभी हमको यूँ न कह रहे होते 

बेरुखी उनकी दर्द दे जाती है तन्हाइयों के चलते 
जीते है उन्ही के साथ वरना अबतक मर गये होते 

न शऊर था नुमाया होने का न चुप ही रह सके
मुश्किल यही है हमारी ,पर्दे हया के न हट गये होते

झांकते न यूँ बंद खिडकियों से इस तरह हम 
करते सौदा औरो की तरह बेमोल न बिक गये होते .

आईने पर नजरे उठाते है साजो श्रृंगार की खातिर
अब देने लगा है धोखा ये भी तुम यूँ न दिख रहे होते.

- विजयलक्ष्मी