Wednesday, 11 July 2012

मारने से पहले ....

क्या करे गुलामी की आदत
लगता है पुरानी है हिन्दुस्तान मैं 
पहले मुगलों की मर झेली 
फिर अंग्रेज चले आये ...
अब घर के लोग ही शमशीर दिखा रहेहैं 
मारने से पहले आजकल बताता भी कौन है .-विजयलक्ष्मी

सरकार सोच में तो नहीं ...

हर शब्द मुखबिरी कर रहा है यहाँ 
हाजिरी की कमी के चलते सजा की दरयाफ्त ,
सुकून ए अदालत को सजा मुकर्रर क्या की जाती है ,
शहंशाही फरमान सुनाया जाय ....
या तब्दीली अभी बकाया है कोई ?
क्या इन्साफ की तौहीन तो न होगी ये ....
आवाम का फैसला क्या होगा उसके बाद ....
सरकार सोच मैं तो नहीं ....किसे गद्दी दी जाये और .......?-विजयलक्ष्मी

जिंदगी मुलिसी मैं चल रही है ...

जिंदगी मुफलिसी में चल रही है 
छप्पर मेरे घर का आधा उजड़ा सा है 
आधे से ज्यादा तो ब्याज मैं चुकता होती है ध्याडी दिनभर की 
अमावस की रात सा उजाला तो बदली मैं छिप गया.....
देखता है बारिश का रुख आज भी ,
भरोसा हों भी क्यूँकर ...सरकारी मुलाजिम जो ठहरे ,
वक्त की पाबंदियां है यहाँ और स्वरोजगारी इच्छाधारी है ...
वेदना ,सोच रहे है अंतर्मन के अंधकूप मैं डाल दूँ तुम्हे ...
फिर कोई न बांच सकेगा ...नयन तुम बरसते क्यूँ हों ..
अभी बादल हैं अम्बर पर ...शांत तो नहीं लगते,
बिजली कडकती है रुक रुक कर ..सहर तक जिन्दा रहे तो ....
आफ़ताब से रूबरू होंगे, रूह के शहर सन्नाटा क्यूँ है पसरा .-- विजयलक्ष्मी

वर्जनाओं की तहरीर लिख देना ...

दोस्ती क्या जानोगे ,
उसपे मिटना क्या जानोगे ,
शब्दों का लुटाना कम था,
खजाना लुटा दूँ ,
वर्जनाओं की तहरीर लिख देना 
देखेंगे ताले कौन कौन दर पे लगाने है. 
मंजूरी होगी या मौत ही मेरी .विजयलक्ष्मी

मिडिया बिक चुका क्यूंकि ..

अखबार सब पढते है यही सच है ,
खबरों का असर होता है अलग सबपर ,
किसी को रोटी की चिंता किसी को मुनिया की शादी 
नौनिहालों का देखकर रोटी नहीं क्या आंखे ,
स्कूल विद्यालय बंद होने की कगार पर है
रो रही है शिक्षा अभी बाढ़ ,कभी फंड की कमी को 
सरकार को चाहिए जेल नई और खुलवादे,
पुष्प कैसे खिलते उपवन मैं ,कोई कहता है पैसों की बर्बादी ,
किसी की छान उडती है तूफ़ान से, कोई दीप दिखाता है रास्ता
वेदना खड़ी दर पे आंसूं बहाती है ,
गीत रीतों के हर पल गुनगुनाती है ,
जरा अब सोच कर देखो रूहों के असर को भी .....
जिसे खुदा के पास भेजेंगे कहेंगे, हलफनामा तुम्हारा था लिखा है नाम जिस पर ,
शिव को परीक्षा लेनी थी मगर ...अमृत भी पिलाया था ...
ये अलग सी बात वही फिर आततायी बन के आया था,
लहू की बात ,बहने दे नयनों से ढलक कर ,
अखबार सब पढते है यही सच है ,
खबरों का असर होता है अलग सब पर ,
क्या इससे देश की हालत मैं सुधार की सम्भावना है ?
मिडिया बिक चुका क्यूंकि .--विजयलक्ष्मी