Sunday, 4 January 2015

" तुम्हे ही पुकारा किये नाखुदा बनाकर "



" ए चाँद जरा ठहर तुझ बिन बसर नहीं ,
न निकले शम्स गर होती सहर नहीं ||

काफिया मिलाया एसे रदीफ़ खो गया, 
लिखे किस पर गजल कोई बहर नहीं||

माटी के घर बेच अट्टालिका खड़ी की, 
गली कुचो में बिखरा अपना शहर नहीं ||

तुम्हे ही पुकारा किये नाखुदा बनाकर ,
थी कश्ती भंवर में दिखी कोई लहर नहीं ||" 

---- विजयलक्ष्मी

Saturday, 3 January 2015

" तुमने कौन सा तीर मार लिया ..?"



 " शब्द की खुरपी से उखाड़ती हूँ दिल की जमीं
तुम्हारी यादो की परत को दर्द से सरोबार मत होना
क्या सत्य का सामना कर सकोगे ?
सोच लो , मेरी खुरपी बस खुरपी नहीं नश्तर सी चुभेगी
भीतर तक गहरा जाएगी जब कुरेदने पर आएगी 

एक साल नहीं उससे भी पहली ढकी दबी कितनी खरपतवार उखड़ेगी
अंदाज भी नहीं लगा पाओगे
एक एक परत पपड़ी सी उतरेगी
नकाब उतरता देखा है ,,,या खाल की तरह उतरती फेसपैक की परत
नहीं न ...मत कहना कभी ...
अब तक क्या उखाड़ लिया ,,?
जो जमा ही न हो गहरे ....वो ही ऐसा बोलते हैं ?
कुछ बातो पर मुस्कुराने की इच्छा होती हैं कभी कभी
मेरे शब्द शब्द नहीं जख्म पर नमक का कम करेंगे
तुम्हारे दिल पर उकेरे गये शब्द जो दिल की कलम से लिखते हैं शिलालेख
उन्हें मिटा डालो न
अपनी हालत देखो ,,
आँखों में इंतजार हैं
मन घायल है
अहसास घुमड़ते है उमड़ते हैं
बरसना चाहते हैं मेरे मन की जमी पर
इंतजार ....दुश्मनी ..दर्द ...बंदूक ..लहू
पुष्प की खुशबू नहीं दर्द की महक निखरेगी उन जख्मो में
तुमने कौन सा तीर मार लिया ..
हमारा तीर तो निशने पर है ...बचा सको तो बचा लो
छिपकर निशाना नहीं लगाया कभी ".
----- विजयलक्ष्मी

"खूबसूरत सहर आती है "

" ये माना सर्द मौसम है आजकल 
मगर पतझड़ के बाद बहार आती है 
रात कितनी भी गहन काली लम्बी हो 
उसी के बाद खूबसूरत सहर आती है  " --- विजयलक्ष्मी

" चलाये कौन तीर जो निशाना साध ले "

समय अश्व की लगाम कसकर साध लें |
विस्तृत आकाश को मुट्ठी में बाँध लें ||

बैठ बहेलिया पेड़ तले सोच रहा दिनरेन |
चलाये कौन तीर जो निशाना साध ले ||

चले विरोधी मिल कैसे सीखे उद्यान से |
कांटे पुष्प सब मिल कैसे जीवन हाथ ले||

विवशता भी बन्ध विश्वास से ढूढे रास्ता|
भाग्य अग्रसरित हो कर्मयज्ञ का साथ दे ||

सूरज बिराज मस्तक राह प्रकाशित करे |
कोई रात अन्धेरी कैसे गर चन्दा साथ दे ||
------- विजयलक्ष्मी

" हाथ में बंदूकें औ बातो में दुराव भरा है जिनके ,"

दिखते हैं कितने ही रंग मगर खुद में बेजार हैं ,
हर दूसरे आदमी के हाथ में देख लो हथियार हैं ||

यूंतो पिता के दिल की धडकन होती हैं बेटिया,
दहेज दानव के उत्पीडन से पिता भी लाचार हैं ||

यूंतो बिन औरत के ये दुनिया नहीं चलने वाली ,
देह बाजार हो या हो विज्ञापन बिकती नार है ||

फूल की बात करने वाले भी कली को नोचते हैं ,
पुरुष कैसे है वो करते बच्ची संग बलात्कार हैं ||

जुल्म की बात करूँ या सुनाऊँ ज्ञान गीता का ,
वो भीतर झांकते कब हैं ,खरीदने को तैयार हैं ||

हाथ में बंदूकें औ बातो में दुराव भरा है जिनके ,
बिलखती मानवता आज उन्ही से शर्मसार है ||
---- विजयलक्ष्मी