Sunday, 3 August 2014

" क्या तुम कुछ समझ पाए "



" समय तो अपनी ही गति से चल रहा ,
लेकिन ..पूछने का मन है 
अभी तक गुजरा क्यूँ नहीं 
कदम समय के ठहरे हैं 
या हमारे घोड़े की गति तीव्र हो चुकी 
समझ नहीं आया ...
समय के घोड़े से तेज चलता है कौन 
रात ढलती क्यूँ नहीं दुनियावी 
या पलके खुली है और समय निद्रामग्न है 
क्या यही भोर के संकेत है
कालिख भरी रात सुरमई होने लगी
वृक्ष जो निर्जीव से लगते रहे थे आजतक 
लग रहे है जिन्दा ..मुझमे 
पीले हुए पत्ते हरे  क्यूँकर लगने लगे 
जीवन संध्या ने सिंदूरी ओढ़नी क्यूँकर धारी 
जिन्दगी का सूरज डूबने की कगार पर चला 
या इन्द्रधनुष उतरा है मेरे भीतर चटकीले रंग लिए 
समय ,,,समय से इतर हुआ क्यूँकर  
समय तो अपनी ही गति से चल रहा ,
लेकिन ..पूछने का मन है 
अभी तक गुजरा क्यूँ नहीं 
कदम समय के ठहरे हैं 
या हमारे घोड़े की गति तीव्र हो चुकी 
समझ नहीं आया ,
बताओ तो ..
क्या तुम कुछ समझ पाए
पहचान सकोगे समय के घोड़े को  "--- विजयलक्ष्मी 

Saturday, 2 August 2014

न गंध मिली न आंचल माँ का

"मन्दिर में पत्थर पूजता है 
सडके असलहा धारियों के नाम लिखी 
शिलालेख लिख डाले तारीफ़ में 
मौत के सौदागरों के 
पूज रहे हैं उन्हें खुदा बनाकर 
धर्म बदलकर पुरखो को भूल गये 
ब्रांडेड धारी हल बैल भूल गये 
भूल गये जमीं का सौंधापन 
खुशबू जो महकाती थी अंतर्मन को 
बेच रहा है माँ जिसे कहता नहीं थकता 
कीमत कई गुनी पाकर अमीर गिन रहा है खुद को 
तुझे गोद नसीब नहीं न लाड़ दुलार 
बता तुझसा गरीब कौन 
न गंध मिली न आंचल माँ का 
रूह का सकूं ढूंढता है लहू के सौदे में 
पूजता है मौत का देवता  और जिन्दगी की आस रखे है 
मन्दिर में पत्थर पूजता है 
सडके असलहा धारियों के नाम लिखी 
शिलालेख लिख डाले तारीफ़ में 
मौत के सौदागरों के 
इन्सान को भी पूज कभी इंसान की तरह "--- विजयलक्ष्मी 

"वात्सल्य तो उसका सारांश मात्र है ".

प्रेम न जिज्ञासा है न पहचान है ....प्रेम बस प्रेम है ..कोई भी इतर भाव अगर इसमें शामिल हुआ तो समझ लीजिये मिला हो गया प्रेम का उज्ज्वल और स्निग्ध आंचल ...प्रेम के लिए यत्न नहीं किया जाता ...ये स्वत:स्फूर्त है ...ये न बिकाऊ होता है न किसी में खरीदने की औकात है.... किसी में ...जिसमें मिला उसमे ईश्वर विराजते हैं ..देह की चाहत प्रेम नहीं है ..दर्शन की इच्छा आँखों की संतुष्टि भाव है जो सरल होकर रसधार प्रवाहित करती है मधुरम स्वरूप की......पाना ही प्रेम नहीं है ......स्व का खोना भी प्रेम है ...देह आकर्षण मात्र है ...शब्द तो अधूरी सी अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है ......जो निश्छल और निस्स्वार्थ भाव है वही प्रेम है ....विस्तृत पटल है प्रेम का ,,,हम ज्यादातर लोग एकांगी व्यवहार को प्रेम मान बैठते हैं ...प्रेम देह से इतर ही शुरू है और देह तो मर्यादा रेखा में बंधी हैं प्रेम सांसारिक मर्यादाओ के बहुत उपर है मृत्यु और जन्म से परे है ...और .."वात्सल्य तो उसका सारांश मात्र है ".---- विजयलक्ष्मी

Friday, 1 August 2014

" बोल पड़ा है दुश्मन बयाँ कर दी न हकीकत "

"ये न पूछ मुझसे मुफलिसी ने क्या दिया ,
देखलो दरमियाँ से दौलत की दीवार हट गयी ||

असलहो की गिनती नहीं आती अभी तुम्हे
मुहब्बत की बंदूक मझधार में पतवार बन गयी||

खंजर के मंजर गोली की बोली की अपनी जगह
जहर माकूल जगह गिरा देखोगे खाई पट गयी ||

संसद में हंगामा नियत बेरुखी से था तुम्हारी 
राष्ट्रहित, असलहे लिए सेना सरहद से सट गयी|| 

बोल पड़ा है दुश्मन बयाँ कर दी न हकीकत 
हालत घुसपैठियों की पतली ,तहरीर पलट गयी ||" -- विजयलक्ष्मी

" नागपंचमी "

नाग पंचमी ...
".आप सब के लिए मंगलमय हो "

नागों ने दूध पीने से किया इनकार 
कहते है कैसे इंसान पर करे एतबार 
बदनाम हम है, खुद उगलते रहे जहर हरबार
हड़ताल कर रहे हैं, मांगे पूरी हो इसबार 
प्रशाशनिक सेवा परीक्षा वाले सडक पर पड़े हैं 
कभी ऑटो वालो की चलती है 

नेताओ ने तो हमारी बिरादरी ही बदल दी 
हमारे जहर का तोड़ ढूंढ लिया और खुद उगलने लगे हैं 
इसीलिए हम भी हड़ताल पर निकल पड़े हैं
कहते हैं इंसानी कौम ज्यादा जहरीला जहर बना रही है 
हमारी सत्ता जहर की छिनती जा रही हैं 
हमे सोचना होगा ...कोई नया रास्ता खोजना होगा 
जिससे हमारी फिर दरकार हो .
हर नये असलहे के रूप में हमारे जहर की दरकार हो 
इसबार दूध भी खुद को पिलाओ --- विजयलक्ष्मी