Wednesday, 12 February 2014

जीवन संघर्ष है

नेह बरसा
बयार बसंती सी 
मन बिहसा 

खिल खिलाती 
मुस्काती है जिन्दगी 
साथ हो तुम्ही .

रास्ता चला था 
झरना मंथर सा 
मंजिल जहाँ

पुष्पित पुष्प
पल्लवित लतायें
जीवन संग

हरित मन
चपल चंचल सा
मन तरंग

शिकायत है
रवायत कैसी हैं
इनायत है

घुटन क्यूँ हैं
मन तरसा क्यूँ है
रुदन क्यूँ है

राजनीति है
जीवन संघर्ष है
परिणति है ...- विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 11 February 2014

"हमने खराब भ्रष्टाचारी रिश्वतखोर नेता चुने हम और आप ही जिम्मेदार होंगे बिगड़े हालात के लिए "

देश में भ्रष्टाचार एक ऊँचा मुकाम पा चुका है ..नेता गलत होगा कहना आजकल के सरगना अभी और उच्च मुकाम पर ले जाने को उत्सुक हैं ...यदि वोट यूँही चंद रूपये और एक साड़ी में बिकती रही ....समाज का तथाकथित सभ्य समाज का हिस्सा यूँही सोता रहा तो .. देश का नाम भ्रष्टतम राष्टों की सूची में प्रथम स्थान पर होगा ........जिसके लिए हम सभी देश वासियों को सम्पूर्ण संसार के सामने स्वीकारना होगा अपना दोष .......चेतो भारतीयो ...चेतो ..वोट जरूर दे ....सोच समझकर दे ..एक वक्त की दारु पार्टी के लिए नहीं अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिए ...देश का नागरिक होने की जिम्मेदारी के लिए ....राष्टीय विकास के लिए ...उत्थान के लिए ...जमीर के लिए ...अपने लिए गैरत मंदी के लिए ...शर्मसार होने से बचने के लिए ...तरक्की के लिए ..अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ....अपनी जिन्दगी के लिए ..आचरण को सुधारना होगा ..सत्य को बांचना होगा ......बंद आँखों से नहीं खुली आँखों से जांचना होगा ..भाई भतीजावाद नहीं ..सत्य की कसौटी पर परखना होगा ...पूरी एक पीढ़ी होम हो चुकी .......देश के हालात बद से बदतर होते जारहे हैं ...जिम्मेदार नागरिक हो होगा ... समाधान भी नेताओं के पास नहीं हम नागरिकों के पास है ...ये नेता  हमारी ताकत नहीं है हम उन्की ताकत है ..उन्हें ये सबक सीखाना होगा ..अन्यथा ,, एक दिन ..देश के प्रत्येक नागरिक को माफीनामा लिखना होगा .."हमने खराब भ्रष्टाचारी रिश्वतखोर नेता चुने हम और आप ही जिम्मेदार होंगे बिगड़े हालात के लिए "" .---एक नागरिक ( विजयलक्ष्मी )

"आज दुपहरी इतनी अँधेरी क्यूँ है "

समन्दर की सुनामी आकाश पर गहरी क्यूँ है 

पूछू एक बात आज दुपहरी इतनी अँधेरी क्यूँ है .- विजयलक्ष्मी 



" जिन्दा बुत बनने को औरत काफी है जनाब "

बुतों को न गिला होता है न शिकवा कोई ,

इस काम के लिए इंसा ही काफी है जनाब .


"न चुभन काँटों की होती है न दर्द सीने में 


चीखकर चिल्लाना इंसा ही काफी हैं जनाब 


चाँदनी खिलती मिले अमावस के बाद भी 


यूँ जिन्दा रहना औरत ही काफी है जनाब 



यूंतो बुतपरस्ती करते है सभी कहते नहीं 


ताजमहल कब्र ए मुहब्बत काफी है जनाब 



कानून औरत के लिए सारे पर्दा चुप्पी संग 


जिन्दा बुत बनने को औरत काफी है जनाब".- विजयलक्ष्मी 


क्या लिखना कत्ल भी किया ,उसीने कभी अपनेपन का अहसास कराया था

कथा लिखनी क्या व्यथा बतानी क्या 

बीतते पलों की कहानी सुनानी क्या 


न लिख लहू छितराकर बिखरा क्यूँ 


न लिख आंसू टूटकर बिखरा क्यूँ 


न लिख ओस का सूखना 


न लिख जिन्दगी का रूठना 


क्या लिखना जो गुजरे अखर कर लम्हे


क्या लिखना जो गुजरते तन्हा सफर पर लम्हे 


क्या लिखना दर्द को भला 


क्या लिखना अहसास जो मरते रहे 


क्या लिखना वतन कितना बिखरता रहे 


क्या लिखना रूह का तडपना 


क्या लिखना किसी गरीब का मरना 


क्या लिखना भूख जान भी लेती है 


क्या लिखना प्यास समन्दर पी लेती है


क्या लिखना चाँद निगला जा चुका 


क्या लिखना सूरज का छिपना 


क्या लिखना क्षितिज धुन्धलाया क्यूँ 


क्या लिखना दिल पथराया क्यूँ 


क्या लिखना सितारों का टूटकर गिरना 


क्या लिखना धरती का बरसात से मरना 


क्या लिखना जले पर नमक भी डाल दिया गर 


क्या लिखना कोई कत्ल भी कर दिया गर 


क्या लिखना सरिता लहू की धारा बनी 


क्या लिखना जिन्दगी और मौत में ठनी


क्या लिखना तमाशा औ जगहंसाई अपनों की 


क्या लिखना स्वार्थ की खातिर तलवार का घोपना 


क्या लिखना मुहब्बत में सबकुछ सौपना 


क्या लिखना राजनीती कलम औ दुनिया की


क्या लिखना रेजा रेजा इज्जत मुनिया की 


क्या लिखना चौराहे इज्जत उछालना 


क्या लिखना बहु को घर से बेआबरू कर निकालना 


क्या लिखना हर चेहरे पर मुखौटा है 


क्या लिखना स्वार्थ की खातिर जरूरी धोखा है 


क्या लिखना शेर भी बस खल ओढ़े है 


क्या लिखना ताकतवर सबका लहू निचौडे है 


क्या लिखना अंधे की रेवड़ी हर हाल अपनों में 


क्या लिखना दिखे गर मौत सपनों में


क्या लिखना जागना रातो का 


क्या लिखना इंतजार सिसकती रातों का 


क्या लिखना सूखता शजर टूटकर गिरता भरोसे का मंजर


क्या लिखना मेरी झोपडी का छान उतारा उसी ने जिसने चढ़ाया था 


क्या लिखना कत्ल भी किया ,उसीने कभी अपनेपन का अहसास कराया था .जिन्दगी का एक 

सबक पढ़ाया था बना खुदा सा सरमाया था ...

वाह रे भगवान ...तू ,किस रूप में आया था - विजयलक्ष्मी