Thursday, 9 August 2012

कहता है अब ,..



गम की राहों से जब से गुजरने लगे हों ,
हर कदम अब तुम निखरने लगे हों .


हमने तो गम खाए है सीने पर जालिम ,
अब जुगनूओं की बात करने लगे हों .


जब रौशनी आई नजर दूर से देखो तो ,
अपनी ही हर बात से मुकरने लगे हों.


अंधेरों में छोड़ा है आज उसने हमको ही ,
कहता है अब ,हद से गुजरने लगे हों .
                                - विजयलक्ष्मी

Tuesday, 7 August 2012

मेरी तरह ..





















मेरे दर्द की छोड़ कुछ अपनी सुना
,
सुना तुमने भी किसी को रुसवा किया मेरी तरह .

भरकर बैठे रहे जज्बात दिल मैं ही ,
हिम्मत न कर सके बताने की उन्हें मेरी तरह.

इन्तजार तो गेसुओं की महक का ,
लबों से मुश्किल है इकरार, बिलकुल मेरी तरह .


पत्थर से शजर और अब गुल ..कांटे ,
बरसते हों दिन रात खुद में, बिलकुल मेरी तरह .


दुनिया बसी है एक खुद के भीतर ही ,
बैठकर अक्सर बात करते हों बिलकुल मेरी तरह .


रूठना मनाना बहुत कर चुके हों तुम ,
कहते मस्त हूँ, पर बीमार हों बिलकुल मेरी तरह .

पुराने साथियों का साथ छूटा है अब ,
सोचा,छोड़ दे देखने ख्वाब भी बिलकुल मेरी तरह .

जी लेंगे, न सोच जो करना है कर गुजर ,
रह जायेगा बंधा मर्यादा में ही बिलकुल मेरी तरह .

                                                                              ....विजयलक्ष्मी

Monday, 6 August 2012

लम्हे बहके बहके से

जमीं की रंगत खिली सी है ,
रंग ओ खुशबू महके से ..
उपवन बागीचे खिले खिले ,
पंछी भी लगते चहके से..
ये दिन दुपहरी चटक हुई है ,
लम्हे बहके बहके से ..
मौसम का असर है या कि ,
गुल क्यूँ है लहके से ..
समय को कह दो थम जाये, 
कुछ रह न जाये कहने से ..

नदी से बहने लगे झरने भी अब
रंगत मिले है सहरा से ..
छोटी छोटी सी बातें है लगे ,
चुभे नश्तर सी गहरा के .. - विजयलक्ष्मी

Sunday, 5 August 2012

यादों को हमने ..












यादों को हमने मोती बना कर सहेज रखा है ,

इसी खातिर खुद को यूँ भी सीप बना रखा हैं ..
जुनूं ए वफ़ा वक्त वक्त पर दिख ही जाता है ,
अहसास ए आइना भी हमने पत्थर बना रखा है ..
बारिश से हमे स्वाति बूँद ही चाहिए इसीखातिर,
पलक पर ओस सी जिंदगी को समन्दर बना रखा है .- विजयलक्ष्मी

अजब सी सहर है न आज ...


ये चुप्पी सालने लगी है अब ...
आवाज को कान तरसने लगे है और हम ..
चौखट के उस ओर की आहट को पहचानने भी लगे है ,
जानते हों तुम इस सच को ..
ये आंगन ,.....खेलते खेलते संजीदगी हों आई है अब ..

और सन्नाटा पसरने लगा है ...
चीखता है कानों के भीतर फिर भी बदस्तूर जारी है ..
कदम उठते उठते भी रुकते से है क्यूँ ?
परीक्षा किसी की नहीं ,खुद की ही है ये ..फरिश्ते जिद कर जाते है ..
माननी पडती है बात और फिर अखबार छप गया ..
मुझे नहीं मिला आज भी पढ़ने को ..
कहाँ चला जाता है ये अखबार इतनी छुट्टी ..?
नहीं सुनता मनमौजी सा हों गया है ..
ख्वाब सा देखता है ...ख्वाब देखना चाहिए जिंदगी के लिए जरूरी है ..
उन्वान न हों तो कदम राह से भटकने का दर भी रहता है
उन्वान ...नहीं इहलाम ...जो झंकृत करते है वीणा के सुरों को
और सज जाते है ख़ूबसूरती से चहुँ ओर ..
अजब सी सहर है न आज ...
जैसे बहुत जल्दी चली आई हों ..
और दिन ..कटते कटते कट जाता है ..
जिंदगी भी साँझ की ओर उन्मुख हुआ चाहती है ..
सदमे में क्यूँ हों ..मुस्कुराहट खोने मत दो अपनी ..
माँ को बुरा लगता है और
वो बूढा बरगद हंसते चेहरे देख कर खिलखिलाता है याद है न ..
उसकी आँखों के आंसूं नहीं भाते ..समझ लो इस सत्य को ..
समझदार हों गए हों अब बच्चों वाली हरकतें बंद कर दो ..जान इस सच को ..
अच्छा बहुत उपदेश हों गया आज के लिए ..पर ..अखबार ..?
लगता आज नहीं मिलेगा .
सहर के सूरज को सलाम किया जाये ..सर पर चढ़ आया है ..
बहुत काम बाकी है अभी ..चलूँ अब .- विजयलक्ष्मी