Thursday, 9 November 2017

" हर झूठ सफेद हुआ तुम्हारे मुख से निकलकर ,,"

हर झूठ सफेद हुआ तुम्हारे मुख से निकलकर ,,
कभी सत्य को अपनाओ ,  झूठ से निकलकर || विजयलक्ष्मी




गजल हो या लतीफा क्या खूब हुनर है ,,
वो संगदिल दुनिया का बड़ा बाजीगर है || ----  विजयलक्ष्मी





रोने में भी लुत्फ मिलेगा कैसे किसी को ऐसे ,
क्या मंजूर होंगे दिल के रिश्ते किसी को ऐसे ।। ------ विजयलक्ष्मी






मालूम न था ,कोई है जो सफर का मुंतजिर नहीं ,
जिसको चाहा , वो इस सफर का मुसाफिर नहीं ।। ------ विजयलक्ष्मी






कुछ तकदीरें भी होती है जो नहीं बनती ,,
कुछ लकीरे होती है जो कभी नहीं मिलती ...||


हिस्सा ओ किस्सा कहे कैसे कोई भला 
सफर भी होते है जिन्हें मंजिल नहीं मिलती ||


होगा कोई टुटा हुआ सा तारा शायद 
वो चमकते हैं मगर रौशनी नहीं मिलती  ||  -------  विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment