Wednesday, 6 July 2016

" गर जमीर जिन्दा होता तो शायद होता विश्वास का काफिला "

" एक आइना हूँ मैं ,,गिरेबाँ में झांकिए ,,
जिन्दगी से पहले वक्त को न आंकिये
 " --- विजयलक्ष्मी
 " काफिला ....
निज स्वार्थ का काफिला ,,

दौलत के बाजार का सिलसिला
साहित्य की ललकार का होता ..
जिन्दगी के साथ का होता ..
दोस्ती का हाथ का होता ..
तो शायद होता विश्वास का काफिला ,,
काटिए गला
रस्ते की सीढियों को तोडिये
निज स्वार्थ हित मुख मोड़िये
बड़े तो पेड़ खजूर भी है साहिब ..
मगर कोई पत्थर नहीं मारता
दर्द की बिनाई पर धरा अभिमान का काफिला
दिखावे जमी पर उगते आसमान का काफिला
होता यदि साथ और अपनत्व का काफिला
तो शायद होता विश्वास का काफिला
नाम रखने से नहीं बनता काफिला
शान दिखाने से नहीं बनता काफिला
रेतीली जमीं पर नहीं चलता काफिला
दगाबाजों के साथ नहीं बनता काफिला
हर आहट पर बनता है काफिला
धडकनों की ताल पर चलता है काफिला
टूटे विश्वास कब बढ़ता काफिला
गर जमीर जिन्दा होता
तो शायद होता विश्वास का काफिला
||"
--------- विजयलक्ष्मी

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