Friday, 15 July 2016

कैसा धर्म कैसा सरमाया, कातिल तुम्हे बनाता है

क्यूँ कहते हो कोई जाति नही आतंकवादी की,
कहो कीमत कौन चुका रहा है अपनी आजादी की ||
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लिए हाथ बंदूक औ गोले भोली जनता को मार रहे,,
फूंको जिस्म, जिन्हें सैनिक मौत के घाट उतार रहे ||
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कुत्सित मन में उपकारों का कोई मोल नहीं दीखता
अपना दुश्मन हिन्दू संग हर सैनिक उनको दीखता ||
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खाता रहा जिस थाली में बरसों उसी में छेद किया,,
नमकहरामी में जिसने अपना लहू ही सफेद किया ||
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मक्कारी संग झूठ बोल सत्य को दफन किया जिसने ,,
जिसने भी तुमको दिया ठिकाना इनाम कफन दिया किसने ||
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गद्दारों को शहीद बताते तुमको तो आती लाज नहीं ,,
इंसानियत को मिटा रहा जो उसको कहते समाज नहीं ||
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ऐसे इस्लाम को क्या कहें जो आतंकी पैदा करता है
हर मुस्लिम के आतंकी होने का शक पैदा करता है ||
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जिसने तुमको पनाह दी उसी का कत्ल किया तुमने
कश्मीरी कौम है कश्मीरी पंडित ,,बेघर किया तुमने ||
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कहीं बंदूक उठी कहीं बम गोलो में आग लगाते हो ..
मारते इन्सान को हैवानियत का खेल रचाते हो ||
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कैसा धर्म कैसा सरमाया, कातिल तुम्हे बनाता है
काम करे काफ़िर वाले औरो को काफ़िर बताता है ||
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क्यूँ इल्जाम लगे हमपर इस्लाम को आतंकी कहते हो,,
तुम ही छोड़ दो ऐसा मजहब जिसमे आतंकी रहते हो ||
----------- विजयलक्ष्मी

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