
तैने ,मुझमे आग लगाई मैंने तेरे भीतर सुलगाई,,
तेरी दोस्ती की लत मैंने अंतिम साँस तक निभाई
--- विजयलक्ष्मी
" कर्मचक्र संग चलता पहिया समयरथ की धुरी का ,,
साँझ सवेरे रोके कौन, थामे कौन जीवन मजबूरी का "
साँझ सवेरे रोके कौन, थामे कौन जीवन मजबूरी का "
--- विजयलक्ष्मी
लगता है झूठे स्वप्न में जी रहे हैं आजकल ...
करें क्या सरकार से घोटाले खफा हैं आजकल
करें क्या सरकार से घोटाले खफा हैं आजकल
---- विजयलक्ष्मी
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