Wednesday, 28 January 2015

" परछाई किसकी कौन ..तुम ..हाँ ,तुम ही हो "

पुरानी गुजरी हुयी कुछ यादे सिमटी है मुझमे ,
या कह दूं चस्पा है कुछ इस तरह 
उतारे से भी नहीं उतरेंगी ..
मेरे दरवाजे से तेरे शहर तक जो रास्ता है न 
कितनी बार चली जाती हूँ उसी मोड़ तक 
तुमसे मिलने की चाहत लिए लौट आई थी
कुछ असमंजस ...कुछ अनजाना सा डर... तुम से .........नहीं.. नहीं.. खुद से
कुछ तो था जो दरमियाँ है आज भी
लो झुक गयी पलकें ..उसी अहसास में तुम सामने खड़े हो जैसे ...
मालूम है नहीं हो तुम ...परछाई है मेरी ही
और तुम दौड़ने लगते हो रगों में लहू बन
टकराते हो दीवार पर मुझमे ही बसे यंत्र से तन्त्र पर जिसे दिल कहते हैं
लिख देते हो वही एक नाम बार बार "अपना "
सरोकार कदमों को न सही रूह को है मेरी औ तुम्हारी ...
परछाई किसकी कौन ..तुम ..हाँ ,तुम ही हो
दूरतक कोई नहीं दीखता ...
यही सच है
पुरानी गुजरी हुयी कुछ यादे सिमटी है मुझमे ,
या कह दूं चस्पा है कुछ इस तरह
उतारे से भी नहीं उतरेंगी
..-विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 27 January 2015

" जहाँ शब्द पिंजरे से लगते है "

" मैं खुश हूँ ?
मुझसे न पूछ ये सवाल 
ख़ामोशी उगल देगी हर जवाब 
बेहतर है ,,चुप्पी के साथ नाराजगी जाहिर करू 
सत्य बोलना कठिन होता है कभी कभी 
और झूठ आप ही अपनी गवाही देता है
शाम ख़ामोशी से पसर जाती है अँधेरे के आगोश में
चिर निंद्रा से अहसास लिए
जाने क्यूँ लगा मुझे
शांत मुस्कान जैसे ...चिपका दिया हो फूल किसी पौधे की डाली पर
मोनालिसा की तस्वीर का सच ...... कोई क्या जानेगा
जो दीवाना नहीं हुआ .
न ओस न आब ,,न खबर कोई अपनी ,
जीने का तकाजा है जिन्दगी अपनी
जहाँ शब्द पिंजरे से लगते है 
और होता जाता है मौन मुखर
चुप्पी चीखो से इतर ..साल जाता है यूँ खामोश सी ख़ामोशी का खंजर
और नाचती है कविता तब ..शब्दों से निकल
चलती है सवार ह्रदय तरंग अश्वारोहण करवाता क्यूँ है
पलको का इन्तजार बन दरबान निहारता निर्निमेष कोई बचा अवशेष
उड़ जाता गगन की और मिलने क्षितिज की और
बहुत घनघोर ,,,मगर रिमझिम सी लगती बरखा
और सहरा में खड़े भीग जाता है क्यूँ मन
लेकिन प्यास अधूरी तृषित तिसाए से हम क्यूँ आज भी
मंथर सा अहसास बना अंगार दहका जाता जाता है
अगरबत्ती सा मन जलकर भी महका रहता है
और नजर झांकती है जैसे आत्मा के भीतर बैठ परमात्मा ढूढती सी
--- विजयलक्ष्मी 

"बंजर जमीं को साँस जैसे मिल गयी हों.."

जिसे जख्म कहा व्ही वजूद है मेरा ..
इसके सिवा मैं खुद भी नहीं मेरा ..----- विजयलक्ष्मी





उसके दर पे हुए सजदे में बस मुझे ही काफ़िर करार मिला 
मैरी पाकीजगी पे यकीन मेरे मोहसिन को ही नहीं .खुदारा ---विजयलक्ष्मी





वो इन्तेहाँ है भरोसे की मुहब्बत पर अमीत
खुद को मापने एक पैमाना हुआ है दिल 
नाज ए हुस्न भी अदा ही समझ एक 
हर हाल बस तेरा ही तलबगार हुआ है दिल --- विजयलक्ष्मी




तसव्वुर की धुप की रौनक तुम क्या जानोगे ,
सर्दियों के मौसम की बानगी का मजा क्या है

अहसास का दुशाला नूर भर गया अन्तस् में
हूँ धुल ही मगर आंधी सा उड़ने में मजा क्या है ---- विजयलक्ष्मी




जमा है किसी बैंक के खाते में 
जमा धन की तरह खत ..
बहुत प्यारे से अहसास भरे है 
दिल में साथ तेरे ये खत ..
इंतज़ार हर घड़ी कि तुम लिखोगे 

ढेर सा इंतज़ार दिए जो खत
आज भी है तसव्वुर में मेरे प्यारे
दुलारे धडकन बने वो खत
.--- विजयलक्ष्मी





भीगे बहुत कल मनभावन सावन की बरसात में ,
लगने लगे हैं खुद को ही नए से जैसे बदल रहे हैं हम 
हों रहा है बारिश का असर अब जान बचती सी नजर आने लगी है 
एक मुस्कुराहट झांकती है बादलों की ओट से ,
और धरा भी सहम कर लजा गयी अपने आप से 

आसमां ने हर तपिश समेट ली आगोश में ...
खो रहे है क्यूँ नयन प्रकृति के उल्लास में ,
छू रही है मलय मन ,आत्मा थिरक उठी नए से अंदाज में ..
अब फसल लहलहाने सी लगी है खेत में ...
बंजर जमीं को साँस जैसे मिल गयी हों..
आईने का सच कहूँ कैसे भला ?हम खुद को उसमे न पा सके ,
रुक जरा सम्भल तो लूं बिखरने लगा है क्यूँ मेरा वजूद ही ,
रंग बिरंगी सी हर डगर लगने लगी ,
महकने लगी है बेला क्यूँ इक ख्वाब सी ...
आदत नहीं है आँख को किसी ख्वाब की, डरते है टूट जाये न .
 

--------------- विजयलक्ष्मी .

Monday, 26 January 2015

" गरीबो और अमीरों में दिल की धडकन जिन्दा होती "

" टूट गिरी धरती पर रिमझिम जीवन खेला बन बैठा
जिन्दगी पर्दे में जा बैठी ,,जैसे मुझसे जग छुटा
इक कलम में कुछ घायल सी ममता इन्तजार लिए
दामन में अपने एतबार लिए ..
.जाते पलो का श्रृंगार लिए
बूँद बूँद से सागर भरता ..
.बरखा पर बादल ही करता
श्वेत हिम गर जीवन न तजता ...क्यूँकर नदिया का जल बनता
न नदिया बहती न सभ्यता जन्मती ...
न धरती होती क्यूँ अम्बर पलता
झूठ न होता गर दुनिया में ...सत्य कोई भी याद न करता
न भाव भरे मन बहते रिसकर ...न घायल कोई भी पल होता
कितना सुंदर होता वो लम्हा ...खुशियों हर पल होता और तबस्सुम तहरीरो में
दिखती सदा लकीरों में ...हाथो की तकरीरो में ,,
कदमो की तकदीरो में ..
गरीबो और अमीरों में दिल की धडकन जिन्दा होती ..
मानवता न शर्मिंदा होती ..
धर्म कर्म के कामों से ,,जाति भेद के नामो से
नफरत की बन्दूको से ,,
अपनत्व की सन्दूको से ...भरते लम्हे जीवन के
और खुशियाँ खिलखिलाती हर इक आंगन में यारा "--- विजयलक्ष्मी 

स्वाति बूँद पर,

हाँ ,समन्दर होगा बड़ा ...
घेरे होगा बाहों में धरा 
जल होता है उसका खारा 
मैंने पीकर देखा इक बार 
मेरी प्यास नहीं बुझी ..... और तुम्हारी .... ? -------- विजयलक्ष्मी




पहाड़ी झरने भले ,
कम दूर चले 
मगर जितना भी चले 
मीठे ही रहे 
न रंग बदला न ढंग 
बस उम्र जरा छोटी ठहरी ------ विजयलक्ष्मी



एक चातक 
विकल 
विचर रहा हू 
नभ पर ,
मेरी नजर 
बस
स्वाति बूँद पर --- विजयलक्ष्मी