Saturday, 3 January 2015

" हाथ में बंदूकें औ बातो में दुराव भरा है जिनके ,"

दिखते हैं कितने ही रंग मगर खुद में बेजार हैं ,
हर दूसरे आदमी के हाथ में देख लो हथियार हैं ||

यूंतो पिता के दिल की धडकन होती हैं बेटिया,
दहेज दानव के उत्पीडन से पिता भी लाचार हैं ||

यूंतो बिन औरत के ये दुनिया नहीं चलने वाली ,
देह बाजार हो या हो विज्ञापन बिकती नार है ||

फूल की बात करने वाले भी कली को नोचते हैं ,
पुरुष कैसे है वो करते बच्ची संग बलात्कार हैं ||

जुल्म की बात करूँ या सुनाऊँ ज्ञान गीता का ,
वो भीतर झांकते कब हैं ,खरीदने को तैयार हैं ||

हाथ में बंदूकें औ बातो में दुराव भरा है जिनके ,
बिलखती मानवता आज उन्ही से शर्मसार है ||
---- विजयलक्ष्मी

Friday, 26 December 2014

" आंसू एक जैसे गिरने चाहिए "



दर्द किसी का भी हो 
मौत कही भी कहर ढहाए 
गोलिया किसी भी देह को छलनी करे 
आंसू एक जैसे गिरने चाहिए 
उत्सव पर दर्द हो बिखरा दर्द के श्वेत पुष्प झरने चाहिए 
दोगलापन कहू किसका मातम है मेरे घर का
मातम पर घंटिया नहीं मोमबत्तियां ही जलनी चाहिए
" क्रिसमस मेरी "है तो तुम्हारी कैसे हुयी सोचना
पेशावर की मौत दुनिया को आंसू थमा गयी
आसाम की मौत पर भी छाती छलनी होनी चाहिए
न दर्द बिखरा न आंसूओं का सैलाब आया
जिन्दगी जिंदगी में अंतर क्या फानी होनी चाहिए
यहाँ भी फूल थे आंगन के यहाँ भी जिन्दगी खोई किसी के लाल ने
दरारे खींचने वालों तुम्हारी अदाकारी भी फजीहत होनी चाहिए
दौलत के पुजारी बने मिडिया वाले सभी
सत्य को उजागर करे मिले मान्यता वरना मुमानत होनी चाहिए
----- विजयलक्ष्मी

" हवस की खोपड़ी है इंसानी देह पर "

कलम चली रंग दुनिया का लेकर
वही हर कदम नया इतिहास घडते हैं

खौफ ए मौत दरमियाना कद करले
उनके कदम हर लम्हा आगे ही बढ़ते हैं

सत्य की लकीरे झूठ को लील डाले
वक्त के साथ ऐसा इतिहास घडते हैं

रौशनी रूह की फरमान उपरवाले का
इंसानियत के झण्डे मुहब्बत पर पलते हैं

भूख उगने लगती है जब दिमाग में
तब कातिल ही तलवार के भेंट चढ़ते हैं

हवस की खोपड़ी है इंसानी देह पर
रौशनी और रोशनाई अपनी घडते है ---- विजयलक्ष्मी

Sunday, 21 December 2014

" रंगीन लिबासो में लिपटा सच चुभता नहीं है "

मार कर खुद को चलो जिन्दा हो जाते हैं ,,,
तोडकर पिंजरा छोडकर देह ... गगन में उड़ जाते हैं 
रूह बनकर इस दुनिया से गुजर जाते हैं 
करने दो इन्तजार दुनिया को ...हम फिर मिलने से मुकर जाते हैं 
जिन्दगी मुर्दों की बस्ती दफन है और हम जिन्दा से दीखते लोगो में मुर्दा 
चलो लाशो को खुला नहीं छोड़ा जाता ...सडन उठती है
नश्वर दुनिया का सच ........नग्न आँखों से देखो
रंगीन लिबासो में लिपटा सच चुभता नहीं है
अच्छा किया प्रभु .............आत्मा को अद्रश्य बना दिया तूने
यहाँ सबका ही मगर बाजार लीग दिया
तू डाल डाल तो पात पात है इंसान
उसने कुछ नहीं छोड़ा ....... तू भी नहीं मिलता किसी से
डर लगता है कही तुम्हे भी किसी ने तो नहीं चुरा लिया
----- विजयलक्ष्मी

" मैं फरिश्ता नहीं हूँ "

" मैं फरिश्ता नहीं हूँ ,,
इन्सान हो नहीं सकता ..क्यूंकि 
उसके लिए शर्त है जिन्दा होना 
मुर्दा होता तो सड़ चूका होता ये तन 
बस पुतला हूँ .. एक 

हाडमांस का ...दीखता हूँ जिन्दा सा
दफन हो चूका हूँ कब्र में अपनी
वक्त आने दो ...
चार कंधो पर लेजाकर आखिरी विदा तो ...आग पर ही होगी
क्यूंकि अभी धर्म नहीं बदला हमने
".
---- विजयलक्ष्मी