Saturday, 4 January 2014

नववर्ष की शुभ एवं मंगलकामना !!

स्वागत है नये साल का ,
नये विचारों का 
नवयुग का 
बदलते लम्हों का 
आप सबके प्यार का 
प्रभु के साथ का 
बडो के आशीर्वाद का
छोटो को प्यार ,,,
बडो को सम्मान
नववर्ष की शुभ एवं मंगलकामना !!.- विजयलक्ष्मी





हमे दरकार मुस्कुराहट की तुम्हारी ..






वक्त अपनी गति से चला जा रहा है ,
सूरज साँझ की ओर ढला जा रहा है
कुछ आम सी जिन्दगी को गुनगुनाले 
साथ मिलबांट लम्हों को ख़ास बना ले 
मुस्कुराहट की आहट होने दो होठो पर 
मरहम भी जरा लगने दो चोटों पर
आओ कुछ सीधे से लम्हों को बाँध ले
छोटी छोटी खुशियों को सबके दामन से बाँध दें 
पल पल जिन्दगी रीत रही है हमारी ,
जिन्दगी से फिरभी प्रीत रही है हमारी .
आओ कुछ पल गुजार दे साथ बैठकर
नदिया समय की न ठहर जाये ऐंठकर
चलो जलधार पर नाम लिख दे तुम्हारा
किया आपके नाम सबकुछ,अब कुछ बाकी कहाँ है हमारा
हमे दरकार मुस्कुराहट की तुम्हारी ...
बस इतने से जिन्दगी संवर जाएगी हमारी .- विजयलक्ष्मी

सही या गलत ...

सही या गलत ...
मिडिया सबको एक आँख से क्यूँ नहीं देखता ,
किसी के लिए सीधी किसी के लिए टेडी 
किसी के लिए आड़ी तो किसी के लिए खड़ी ..नजर क्यूँ रखता हैं .
वैसे सुना है मिडिया की मण्डी की पहुंच ऊँची है बहुत ..
पहले तरुण तेजपाल मण्डी का राजा था ...अब केजरीवाल सबसे बिकाऊ माल .-- विजयलक्ष्मी




रंग खिला रहे है गुल रंगीले आंगन में मेरे




रंग खिला रहे है गुल रंगीले आंगन में मेरे ,
जैसे स्वप्न सलोने सजते है नैनो में तेरे .

पंछी बन मन चहक उठा करता किलोल
जब मधुर स्मित सी खिलती होठो पे तेरे

शरमाई सी हया पलकों पर आ कर बिखरी
जैसे अलबेली तितली इठलाई घरोंदो में मेरे

कुछ ख्वाब रुपहले बन बैठे मन के भीतर
छलकी खुशियाँ उद्वेलित ह्रदय झरनों में मेरे

इक आंगन नहीं महके तो मुश्किल हंसना
खो जाने दे हर गम को यूँही अब हाथों से तेरे .---- विजयलक्ष्मी

यथार्थ से परे जहां गगन धरा से मिला

सत्य ,शौर्य यात्रा .....जीवन नकारात्मकता के फूल 
बिखरता दम्भ ,सौन्दर्य को उपालम्भ ,सत्य के शूल .

श्रद्धासुमन चढ़ा आगे बढ़ ,सम्भव हो टंगडी मार गिरा 
जैसे चाहे खौफ दिखा साम दाम दण्ड भेद चटा दे धूल .

कुछ कर गुजर कहीं भी पहुंच, किसी सोपान पर खड़ा 
हो प्राचीर कितना भी बड़ा अपनी जमीं कभी मत भूल 

सत्य कंटक अमरकंटक सा चुभता जरूर करता मगरूर 
शैल्य प्रक्रिया से गुजर धता बता ,प्रखर नवीन निर्मूल .

पग जिस पथ धरा निशानदेही बना ,पाषाण गिरे पिघल
यथार्थ से परे जहां गगन धरा से मिला ,क्षितिज समूल .-- विजयलक्ष्मी