Thursday, 9 February 2017

" गाँधी जी की जरूरत "

" गाँधी जी की जरूरत 
कभी नाम के लिए ,,
कभी आराम के लिए 
सोची नहीं कभी ईमान के लिए ,,
रखी सम्भालकर बकरी की वो रस्सी 
खो गयी मगर बुनी जो भगतसिंह के वास्ते ,,
किसने की मुखबिरी आजाद के लिए ,,
कराओ तलाश उसकी भगवान के लिए
क्यूँकर गिरा जहाज ,,क्यूँकर मरे सुभाष ,,
लड़ते रहे जो देश के जवान को लिए ,,
न बिस्मिल की याद आई ,,
न महामना दिए दिखाई ,,
महाराणा की कहानी अधूरी क्यूँ सुनाई ,,
क्यूँकर बंटवारा देश का रास आया
कैसे किये वचन किसका था वो परछावा
राम की धरती किसने भेंट चढाई
लुटेरे और आतंकी हुए सभी आतताई
ताशकंद की घटना कैसे अंजाम पाई
सत्य छिपाया किसने ,,
गुनहगार कौन था ,,
ढूँढना होगा सत्य ,,इतिहासकार कौन था ,,
किसने झूठ बांचा ,,किसकी बिकी कलम थी ,,
वो कौन था जिसमें सच्चाई कम थी ,,
कातिल के साथ कातिल ,,न आँख नम थी ,,
पर्दे उठने चाहिए ,,
झूठ मिटने चाहिए ,,
पुराने सफे कभी तो पलटने चाहिए ,,
उलझे हुए पल सुलझने चाहिए ,,
ये अधिकार है हमारा ,, और कर्तव्य भी यही है ,,
कालेपानी में किसको क्या भोगना पड़ा ,,
किसने देशद्रोह किया ,,किसे सत्ता से प्यार था ,,
किसने ब्याहा आजादी को ,,
किसने लहू से दुल्हन सा श्रृंगार किया ?
-------- विजयलक्ष्मी

" सुना है चाँद को नुमाइन्दगी ए मुहब्बत "

सुना है चाँद को नुमाइन्दगी ए मुहब्बत
श्वेत वर्णा चांदनी भी दाग न छिपा सकी ||

चुभन हुई पलक पर आँख में स्वप्न सी
नदी बन संवरी, खारापन न मिटा सकी ||

भूख मिली बिखरी मुखिया के द्वार पर
करोड़ो डकारे गये ,,गरीबी न हटा सकी ||

इज्जत औ इजाजत को गुलाम न समझ
नियत का खोट तेरी ,बाते न समा सकी ||

ईमान दिखाने को नहीं निभाने की बात है
तेरे झूठ की नदी,, किनारे न बना सकी ||

मांगता न सबूत कभी तू खुद को भी आँक
झूठ की झड़ी जमीर की भूख न मिटा सकी ||

पद-गरिमा का बखान शोभा नहीं देता
अपनी करनी तेरी फजीहत बचा न सकी ||

जिसकी सरकार "अच्छे दिन " पूछता फिरे
कितना ईमान बाकी है आइना न दिखा सकी ||
-- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 8 February 2017

" काटा गया इंसान हर बार,,वोट,वाद पर .."

" कभी जातिवाद पर कभी आतंकवाद पर ,,
काटा गया इंसान हर बार,,वोट,वाद पर ..
साम्प्रदायिकता पर कभी या वंशवाद पर,,
लुटती रही जनता सुन चोट गरीबवाद पर
जेबें फटी है मगर घूमते विदेश हैं साहिब ,,
हवाई चप्पल पाँव में मौज छुट्टीनाद् पर
किराए नहीं पैसे दिखावा मैट्रो सवार हुए
बेतुके इंसान सभी है राष्ट्रिय-विरोधवाद पर
केसरिया रंग जाने कब आतंकी हो गया
झगड़ा नहीं आतंकियों के मजहब-निनाद पर
जहां शांतिदूत बन्दूकों के साथ चल रहे हैं
खाली हाथ केसरिया रंग आतंकवाद पर
जिनको दी पनाह वो कैसे मालिक हो गये
जान औ माल सुरक्षा भी ठहरी बवाल पर
कभी कैराना कभी आसाम कभी बंगाल में
ढूंढिए जनाब पुरखे मिटे किस जंजाल पर
मैं नहीं ,थी पीढीयाँ अपनी भी युद्ध में ..
पायी है आजादी पूर्वजों ने खेलकर जान पर
बहुत हुआ आतंक अब और कितना सहेंगे
जिन्दगी भी कैसे कबतक रखेगी सम्भालकर ||
" ------- विजयलक्ष्मी

Saturday, 4 February 2017

" आजादी के सीने में घुटती चीख सुनो तुम ,,भूकम्प तो आया ,,बदस्तूर ........||"


भूकम्प तो आया ,बदस्तूर आया ,, लेकिन पाले बदल बदल कर ,,, जहां आना था नहीं आया ,,, धरती तो कांपी जोर से ... अस्तित्व के हिलने का अंतिम कगार का चेहरा मोहरा दर्शा कर गया ,,, दो -दो भूकम्प आये संसद के अंदर भी ...और संसद के बाहर भी भूकम्प था ,, पत्रकार और नेता रूपी डॉ और नर्स अपनी अपनी कैची लिए टटोल रहे थे ,,, कौन सी नस काटे जिससे साँस बंद हो जाये ... सरकार की और लोकतंत्र जो युवा हो रहा है उसे फिर से मृतप्राय कर बोरी बंद करके रख दे जैसे बरसों से किया था .......... लेकिन समय बदल रहा है ... सोच बदल रही है ...
वंशवाद की स्पष्ट रेखा क्रम को समझ रही है ,,, कोंग्रेस को पिछले चुनाव में ऐसा ICU में भर्ती किया है ..... पुराणी बिमारियों का इलाज किया जाना है ,,,
पुरानी जन्मो पर हुई विकृतियाँ ,,, तभी स्वस्थ्य लोकतंत्र पैदा किया जा सकता है .... विकृत बीमार जननी के बच्चे दिव्यांग या बिमारीग्रस्त ही रहते हैं .... या चोर उचक्के ,,अजब अजब औलादों ने जन्म लिया ... इस जननी का दावा कल सुसंस्कृत दाई के हाथो हुयी जाँच में हुनरमंद बैद्य की तरह नब्ज पकड़ी और जननी और औलादों की गिनती शुरू हुई ......... लोकतंत्र के नाम पर उपजे .. वंशवाद ,, आपातकाल ..मजहबवाद ,अंग्रेजियत गांधीवाद ,,लूटवाद फूटवाद जातिवाद खादीवाद ,, टूजी थ्रीजी ,, जितने भी अचारविचार भ्रष्टाचार थे अधिकार कर्तव्य के व्यक्तिगत कानूनची पर्सनललाज बायलाज लालसलाम ,370 जितनी भी औलादे गिनाई .......... उनमे लोकतंत्र का नाम तो था लेकिन वो खुद नदारत था ,,, सेकुलरिज्म के नाम पर साम्प्रदायिकता के साक्ष्य मिले ,,, इतिहास अपनी सुरत पर रो रहा था कोने में पड़ा हुआ .... जिसपर हर किस्सा कहानी महज जबानी था ...और वसीयत खानदानी हो चुकी थी ....... और सहायक बेचारे उठाकर भाग भी नहीं पा रहे थे ........ लग रहा था सर धुन रहे हैं किस घड़ी में मुद्दे बेमुद्दे हुए ... ये नया वैद्य तो नब्ज पकड़ते ही बीमारियाँ गिनाता है ........ दीखता चुप है इलाज क्या करेगा नहीं मालूम लेकिन बीमारी जड़ से खत्म होगी इसकी गारंटी दे रहा है ........अमा यार कोई तो बचाओ ..... ये बचायेंगे क्या ... वैसे शहीद भगतसिंह ,,चन्द्रशेखर आजाद बिस्मिल जी असली नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के संग अनेक शहीदों की आत्मा मुस्कुराई जरूर होगी ,,इस बात की शर्त लगा सकती हूँ ........ हर शब्द पर खिलखिलाए होंगे गाँधी जी ...... यह सोचकर जब भंग करने को कहा तो कोंग्रेस भंग नहीं की गयी न अब भुगतो पुराने घोटालो का भी मजा ,,,,, वरना अमर रहते इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा नाम यूं तो मिटटी में नहीं मिलता ,,, जनता से निसर्ग किया था ,, संसर्ग के स्थान पर अब इज्जत का फलूदा बना जा रहा है ,,, स्वस्थ्य लोकतंत्र तो जन संसर्ग से ही मिलेगा ........ आत्मा को नैसर्गिक करना होगा ,,,, अन्यथा ये बैंड तो यूँही बजेगा और हर बार आरती उतरेगी लेकिन ...वरमाला वही पड़ेगी ....दूल्हा यूँही नहीं बदला था ... दो साल पहले की गैस की लम्बी लाइन याद आगयी अचानक ........ नोटबदली में पचास दिन में तो लाइन से फारिग हुए ........ पहले तो गैस की लेने कभी टूटटी ही नहीं थी ,,, देह टूट जाती थी ,,,दिन निकल जाता था लेकिन ....रोटी बनेगी या नहीं .......नहीं मालूम था || इतिकृतम ||
-------- विजयलक्ष्मी

" आजादी के सीने में घुटती चीख सुनो तुम ,,
देखो उसके सीने सांसे कितनी बाकी हैं ,,
कुछ ख्वाबों को चुनकर उन आँखों पर धरना था 
भीगी पलकों के खारे जल से शुद्ध जहां करना था 
देशराग गूंजता है लहू के संग टकराकर मेरी धमनी में 
देता है टक्कर रह-रहकर इस दिल की दीवारों पर
और आँख धुंधलाई ठहरी है टिककर ..
खौफ है नजर से वो इक तस्वीर न धुल जाए ,,
बंद मुट्ठी का इक अधुरा सा ख्वाब न खुल जाये ,,
रणभेरी बज उठे तो फिर आराम कहाँ ,,
उठ खड़े होकर लड़ो ,,स्वाभिमान के लिए जीवन बना संग्राम यहाँ || "
--- विजयलक्ष्मी

Thursday, 2 February 2017

" बेगैरत ये दुनिया,सफेद झूठ बोलती है ,,"

" बेगैरत ये दुनिया,सफेद झूठ बोलती है ,,
कल थी चुप्पी ओढ़े आज अहसास तौलती है ||

ढूँढने खजाना तोड़े दर औ दीवार,मेरे घर
बादलों पर पार नहीं बाढ़ को ट्यूवेळ खोलती है||

मांगी कब दौलत, अहसास खजाना संग
खामोशी भली,फरेबी तरीके विश्वास तोडती है ||

यूँही ताले तोड़ने वाला चोर कहा जाता है
पुलिस भी ताले बिना वारंट के कब तोडती है  ||

जिसने चखी है ख़ामोश तन्हाई मन की
पूछकर देखते उसी से शहनाई कैसे बोलती है || "
 ---- विजयलक्ष्मी