Thursday, 19 March 2015

" आज फिर खाली हाथ चली आई शाम "

आज फिर खाली हाथ चली आई शाम ,
कुछ रूठी सी लगी कुछ शरमाई शाम
आज फिर ..
कुछ यादे भी है और आवाज भी यहीं
बहती नदी सी अहसास ए तन्हाई शाम
आज फिर ...
नमी तो नमी बादल भी गरज रहे है
दिल की जमी पे बिखरी बलखाई शाम
आज फिर ...
पलको पे ख्वाब ठहरे औ साँसों में नाम
जिन्दगी कौन डगर तन्हा घबराई शाम
आज फिर ...
कुछ सहमे सहमे से लम्हे भी गुजरे है
साहिल को ढूंढती निगाह इधर आई शाम
आज फिर खाली हाथ चली आई शाम , ---- विजयलक्ष्मी

" विरोधी न बन सहयोग कर ..यही नहीं रुकना है मुझे "

" जब मन धधकता है चिंगारी सी सुलग उठती हूँ ये सच है
जलाकर रख कर दूं कायनात सारी मशाल बनकर ये सच है
लेकिन मुझे मालूम है किसी के कहने से नहीं बदलता वजूद मेरा
मैं औरत आधी दुनिया मेरी है और बाकि बकाया आधी ..को जन्मना है मुझे
ये भी सच है ...इस दुनिया को बदलना भी है मुझे
संवारकर धरा को संवरना भी है मुझे
ओ पुरुष ,,स्वर्ग का निर्माण धरा पर भी करना है मुझे
विरोधी न बन सहयोग कर ..यही नहीं रुकना है मुझे "--- विजयलक्ष्मी

" यूँ तो मौत से निकाहनामा पक्का है हमारा "

 "इक ख्वाब संवरने दे ए जिन्दगी पलकों पर ,
यूँ तो मौत से निकाहनामा पक्का है हमारा "--- विजयलक्ष्मी

Saturday, 14 March 2015

ए औरत ..बढ़ चल मंजिल की और

" ए औरत कौन करेगा इज्जत तेरी ..?
गर . हत्या की आरोपी होगी
गर ..दहेज़ की खातिर पिता को तिल तिल जलाती होंगी
गर ..भ्रूणहत्या की भागी होगी
गर ..बेटी के लहू की प्यासी होगी ...
गर ..झूठे किस्से घडती होगी
गर ..माँ बाप को बेघर करती होगी
गर ..बहु को जिन्दा जलाती होगी
गर ..बेटी को कमतर समझती होंगी
गर औरत होकर भी औरत को निचा दिखाती होगी
गर और औरत होने पर शर्माती होगी
गर लाज चौराहे उडाती होगी
माना औरत होना दुष्कर बहुत है ..
आजादी मिलना कठिन कर्म है
पुरुष प्रधान समाज प्रथम है
औरत को बढना भी मुश्किल
नई दुनिया घड़ना भी मुश्किल
फिर तू ही जीवनदायिनी
फिर भी तू ही मनभावनी
फिर भी तू ही जग अधिष्ठात्री
फिर भी तू ही मातृशक्ति ..
तू भैरवी तू ही काली
तू अन्नपूर्णा तू ही गायत्री
ममतामयी और सबसे निराली
पुरुष कहे कुछ नहीं होना ..
तुझ बिन कब मुमकिन धरती पर हरियाली होना
तू सम्बल तू ही सहारा ..
ये जग बस तूने ही संवारा
ए औरत ..बढ़ चल मंजिल की और
तुझ बिन नहीं इस दुनिया को ठौर
नदिया बनकर बहना होगा
सफर समन्दर तक करना ही होगा ---- विजयलक्ष्मी

तुम सम्यक कोण हो या पूरक ..

" तुम कौन हो ए जिन्दगी बताओ तो सही ?
तुम सम्यक कोण हो या पूरक ..
गति के मूल सिद्धांत हो या अनुपूरक
सवाल इक लिए ये जिन्दगी इतिहास हो रही है
अंको के गणित सी साथ चल रही ...

भावना की भौतिकी उलटी ही चली यहाँ
उठती भावनाओं से बना आंसू नीचे ही गिरा
बिन मिलाये रसायन खारा हुआ नैन-जल
बस कुछ उदासी भरे मिलाये थे पल
जब मुस्कुराये ...आलम फिर भी वही था
गमगीन आहटों से भी किस्सा रंगीन था
थोड़ी ख़ुशी तो थी कहीं पाने की ख्वाब में
पहाड़ सी जिन्दगी का तमाम भूगोल किताब में था
खिलता रहा गुलाब सा संग काँटों को लिए
ठोस अवस्था में बता कैसे लम्हे तमाम पिए
बहते रहे हम लेकिन नदी भी न बने
बैठे थे पेड़ के नीचे विपरीत भावनाए गुरुत्वाकर्षण के बल से थी
भावनाए उलटी दिशा में उठ रही थी
बहते थे आंसू तटबंध तोडकर
बाढ़ तो थी ...दुनिया अपने सिवा किसी की न बही ..
बांध भी इंटों से न बन सका
संत्वना के भरोसे था विश्वास पर टिका
दिख रहे विषय थे सब घूमते हुए
समाजशास्त्र में भी अर्थशास्त्र था घुसा
नागरिकता लिए शास्त्र लुटा जा रहा
बागवानी के सिद्धांत भ्रष्टाचार पर टिके थे
तुम समझ सको तो .....समझाना हमे भी ...
जीवनशास्त्र का रंग सबसे जुदा है क्यूँ 

 तुम कौन हो ए जिन्दगी बताओ तो सही ?
तुम सम्यक कोण हो या पूरक ..
गति के मूल सिद्धांत हो या अनुपूरक
 घरो में सभी के मनीप्लांट लटके थे
पैसो के पेड़ मेज के नीचे उगे थे ..
कागज पर बैठने को चिड़िया के दाने बिखरे थे मेजपर
".------ विजयलक्ष्मी