Thursday, 7 August 2014

" लेकिन... मृगनयनी नहीं हूँ .."


" अनघड सा चेहरा है मेरा ,,
बिलकुल मेरे शब्दों जैसा
थोडा आड़ाटेड़ा सा ..
बिलकुल मेरे भावों जैसा
रंग स्याह हो आया पकपक कर वक्त की आँच पर
बिलकुल मेरे तीखेपन जैसा
मोटी सी रक्तिम पंखुड़िया नहीं कह सकती मैं
रंग खो गया अधर का जीवन के झमेले में
कौन सुर्ख सुंदर होता है तन्हा बैठ  अकेले में
सफर धुप और छाँव नदारत ..
ऐसे मेरे कदम पड़े है
और मैं ...सबसे बदसूरत रंगढंग लिए
बहुत अजीब पर ..अलग हूँ दुनिया से
ये इतना ही सच है ..
जितना मेरे मन पर तुम रहते हो
कोई हसीना नहीं गगन की
न हूर कोई जन्नत की
न नूर किसी मन्नत की
बस साधारण से भी साधारण
थोड़ी जिद्दी सी ..सिर्फ तुम्हारी खातिर
मानिनी समझ बैठी खुद को
भूल गयी थी
"आइना "
तुम्हारी आँखों में तस्वीर देखकर सहम गयी हूँ
इत्रफुलेल की खुशबू क्या होती ..मालूम नहीं है
देह पसीने से लथपथ
चलती  जीवन रेले में
सोच रही थी बैठ अकेले में
तुम स्वप्नसुंदरी समझ गये गर ..ह्रदय तुम्हारा होगे टुकड़े टुकड़े
मैं रानी नहीं किसी महल की
न मैं राजकुमारी
बस सोच रही हूँ सच कह्दूं
चेहरे मोहरे का
हाँ जुगनू बन चमकती है गहन अँधेरे में
लेकिन ....मृगनयनी नहीं हूँ
न आवाज कोकिला सी अपनी
रस भूल गये मधुरता छूट गयी दुनिया के मेले में
आस करूं ..
उम्र के पड़ाव पार करती हुई" गोधुली पर खड़ी मैं "
विश्वास झलकता मिल जाये शायद ..जो कदमों में पहना है मैंने
कुछ आधीअधूरी सी तस्वीर हूँ रंगभरी मैं
कुछ उतरे से कुछ खुरचे से
थोड़े सच्चे से बाकि फर्जी से
घड सको गर तस्वीर कोई
तुम ब्रह्मा बन उतार लो चाक से अब मुझको
"वही मैं हूँ "
" क्या फिर भी अपना कह सकोगे मुझको तुम " ?
पहचान सकोगे
हो गयी कभी मुलाकात इत्तेफाक से अगर "-- विजयलक्ष्मी


" हे राम ! तुम्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे कह दूं मैं ?"



" हे राम तुम्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे कह दूं मैं ,
तुमने मर्यादा धारी ,लेकिन किस अर्थ में ,
बेटे मर्यादित होंगे मात पिता के तुम .
माना तुम भाई भी बहुत सुघर सुंदर और प्यारे रहे होंगे 
ममता बरसाई होगी तुमने अपने बेटो पर ..लेकिन 
माना तुम योद्धा भी बहुत भारी ...तुमने रावण सेना मारी माना किन्तु 
तुम मर्यादित हो कैसे मानू ..
तुम मर्यादित हो कैसे मानू ..
पूज रही हूँ तुम्हे जन्म से किन्तु ..
कुछ प्रश्न मन के पटल पर उभरते है प्रतिपल 
चलती है छाया चलचित्र सी प्रतिपल 
क्या कोई उत्तर मुझको मिल सकेगा 
तुलसी के राम कहू या वाल्मीकि के राम 
हे दुनिया के मर्यादित राम ,,
तुमने मांगी अग्निपरीक्षा सीता से ..
तुम लीलाधारी होंगे तो हुआ करे ..
तुम लीलाधारी होंगे तो हुआ करे ..
मेरा मन अधीर हुआ सीता की सुनसुन कर 
जलकर भी जली नहीं जलकर मरी नहीं ..जिन्दा ही जिन्दा 
फिर राजा की मर्यादा खूब निभाई तुमने लेकिन ..
सीता को रानी के पद से दिया उतार कान के कितने कच्चे ..
समाज की मर्यादा धारी तुमने ,,सीता के प्रति अवसरधारी तुम 
सीता ने प्रस्थान किया था तुम संग सीता मर्यादित नारी तुम कैसे ..मर्यादाधारी ?
गर्भवती नारी को तुमने भेजा घर से बाहर कैसी मर्यादा तुम्हारी...हे मर्यादाधारी |
नारी की हर मर्यादा सीता ने धारी किन्तु ..
पुरुष प्रधान समाज रहा कब खुद मर्यादाधारी 
हे मर्यादा पुरुषोत्तम ...गर यही मर्यादाये हैं ...
तो ...मुझको पुरुष बनाना मत .
जो पुरुष तन दो कभी ...अपनी मर्यादा सिखाना मत 
अन्यथा मुझको खुद के भीतर झांकना होगा 
एक पत्नीव्रत को पूरा पूरा आंकना होगा 
पति बने ..कहाँ गयी पति मर्यादा तुम्हारी 
अजन्मे भ्रूणों के प्रति क्या इतनी ही चिंता थी तारी 
कैसे मर्यादित पिता हुए..देखी नहीं प्रसव वेदना ममता की .न बालक की पहली किलकारी 
हे मर्यादाधारी ......क्या पत्नी के प्रति बस इतनी ही मर्यादा रही तुम्हारी 
समा गयी धरती में हो लाचार ...महान सीता बनकर बेचारी 
हे राम तुम्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे कह दूं मैं ,

तुमने मर्यादा धारी ,लेकिन किस अर्थ में ? "--- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 6 August 2014

कन्या के ऊपर ही उठते है हथियार....||




"माँ सच कहना क्या बोझ हूँ मैं 

इस दुनिया की गंदी सोच हूँ मैं 
क्या मेरे मरने से दुनिया तर जाएगी 
सच कहना या मेरे आने ज्यादा भर जाएगी
क्यूँ साँसो का अधिकार मुझसे छीन रहे हो 
मुझको कंकर जैसे थाली का कोख से बीन रहे हो 
क्या मेरे आने से सब भूखो मर जायेंगे 
या दुनिया की हर दौलत हडप कर जायेंगे 
पूछ जरा पुरुष से ,
"उसके पौरुष की परिभाषा क्या है "
जननी की जरूरत नहीं रही या 
जन लेगा खुद को खुद ही ?
हर मर्यादा तय करके भी उसको चैन नहीं 
भोर नहीं होती जब होती रैन नहीं 
कह देना कह देना दुनिया में तो उसको मुझे लाना होगा 
वरना आगमन को पुरुष को खुद ही समझाना होगा 
जितना मुझको लील रहा है कह देना 
दर्द बेटे न मिलने का फिर सह लेना 
वंशबेल की शाख अधूरी रह जाएगी 
पूरी होगी तभी 
जब लडकी धरती पर आएगी " "

.--- विजयलक्ष्मी




" तुझको जिन्दा रखकर भी जिन्दा रह लेती हूँ "

जानती हूँ समाज बदल गया यही आवाज उठेगी ..किन्तु अंतर्मन में झांककर सच का आइना सामने रखकर बोलना ..क्या वाकई में हम और हमारा समाज इतना बदल गया है ...या अभी भी कोई कमी है ..

एक सत्य अटल सा ..
फिर क्यूँ झुठला जाती है उसे 
औरत की मृत्यु ..
फिर भी दिखती है जिन्दा 
कितनी बार मरी या मारी गयी 
जन्म से से पहले से शुरू हुयी कवायद 
सम्भावना जगत में जीव के आने की..
पहला डर--लडकी तो नहीं ..मर गयी वो उसी पल ..इसी खौफ से 
जाँच में पाया गया ..लडकी ही तो है ..
उफ़ ..लडकी ,,नहीं चाहिए ..फिर मरी अहसास से 
उसके बाद की कवायद ..
टुकड़ों में काट काटकर
एक औरतनुमा जीवनदायिनी ने मुक्ति देदी ...
एक पुरुष के जिम्मेदारी से भागने पर ..
और वो वही मर गयी ...समर्थ पिता की असमर्थ बेटी जो ठहरी .
गर यहाँ बच गयी किस्मत की मारी ..मरेगी जन्म के समय ..
खबर में उतरा चेहरा लिए जब सिस्टर आई और बोली ..
लक्ष्मी आई है ...और पिता थूक भी सटक नहीं सकेंगे सदमे में ..
वो मर जाएगी समझ आने से पहले ...क्या हुआ ?
फिर मरेगी अक्सर भूख से रोते रोते ...माँ को जब फुर्सत न होगी काम से
बिलख बिलखकर रोते रोते कितनी बार साँस टूटती टूटती जुड़ेगी मेरी ..
या हो सकता है धतुरा ही चटा दिया जाये आँखे के ढूध में मिलाकर ..और मुक्त ,
न कर पाई कोई दाई या चाचा चाची कोई ये काम ..साँस न टूटी गर ..
जिन्दा से शरीर में होगा फिर मरण जब चलेगी पैरो पर और दौड़ेगी बाहर को
या आगमन होगा नये शिशु का भाई बनकर ..
उसकी खुशियों का अम्बार मेरी मुस्कुराहट तो छीन लेगा ..
वंशबेल बढ़ी चिराग है घर का और मैं पराई ..पैदा होने पर हुई या पहले से थी..
आजतक भी समझ नहीं पाई
ख्वाब छिनने थे छिनने लगे ..काम के नाम पर
औरत जात थी न मैं
हर ख्वाब के साथ मरती और फिर जिन्दा हो जाती अगला ख्वाब आँखों में बसाए
घर के काम से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई ..
भाई डॉक्टर या इंजीनियर जो भी बनना चाहे ..
मुझे कॉलेज की पढ़ाई भी प्राइवेट ही कराई ..
अब मैं भूल रही थी मरना अपना जिन्दगी के हर कदम पर ..
हर कांटे का दंश जैसे जीवन सिखलाता चलता था
जीवन की निराशा में भी मैंने हंसना सिख लिया था ..
पराई थी पराई कर दी गयी ..
ख्वाब पिता का ..इज्जत खानदान की कांधे धर दी गयी
और ..फिर नया सा ख्वाब सजाया पलकों पर ..
पर गरीबी और औरत होने ने पीछा नहीं छोड़ा
पराई आँखों ने दहलीज के भीतर भी देह को नहीं छोड़ा
लेकिन मैंने भी फिर से अगले ख्वाब को सजाना नहीं छोड़ा ..
कभी देह से कभी नेह से समाज ने बलात प्रहार किये
जख्म मिले जितने उतनी मेहनत और सफाई से मैंने सिये
ठान लिया मन में किसी भी जख्म को पैबंद सा नहीं लगने दूंगी
फिर एक नन्हीं सी परी ...उसे नहीं मरने दूंगी ..किसी लम्हे को दुबारा नहीं गुजरने दूंगी
लेकिन क्या एसा ही हो पाया ..क्या घर समाज पुरुष इतने आजतलक बदल पाया
हर मुमकिन कोशिश फिर भी बच्चों की हंसी में अपना खोया बचपन जी लेती हूँ
टूटते हुए ख्वाब के जख्म फिर फिर सी लेती हूँ ..
औरत हूँ न हर मना के बाद भी उड़ान हौसले की उड़ लेती हूँ ,,
मरती हूँ भीतर से या टूटकर जी लेती हूँ ,,
कैसा भी हो जहर अब तो बिन आवाज बेखटके पी लेती हूँ
कोशिश भी करती हूँ लड़ने की ..
कदम दर कदम मंजिल पकड़ने की
कहीं कुछ तो है ...बार बार मरती हूँ ...पर जिन्दगी जी लेती हूँ
औरत हूँ न ...पंख धरे गिरवी जैसे चिरैया के ..
लेकिन उड़ान हौसले की रूह से आज भी उस लेती हूँ
मौत भी हार रही है हरा हराकर मुझको ,,
मैं जो भी जैसी भी ..किसी से नहीं लड़ सकती गर खुद से तो अब लड़ लेती हूँ
मैं औरत हूँ ..इल्जाम और चुप्पी का नाता बहुत पुराना है
ये समाज एसा ही है हर युग में इसको एसा ही आना है
मैं हूँ आधी दुनिया कहने को ..
फिर भी तेरी आधी दुनिया को पूरा कह देती हूँ
मैं औरत हूँ ...हौसले का दूसरा नाम हूँ ..
तुझको जिन्दा रखकर भी जिन्दा रह लेती हूँ--- विजयलक्ष्मी 





सोचो तो ...
फिर से जीना पडेगा तुम्हारे संग ..
वो ही एक कड़वा सच ..
जिसके साथ मैं भी बडी सब कुछ ..
बदलने की चाह ..

भारी पड़ रही है और फिर वही ..
कुछ नहीं बदला ..
हाँ तरीके बदल गए है दिखावा है
भीतर से नहीं ..
मर जाओ कोख में ही मेरी तुम अब ..
बेटी के लिए ..
नहीं चाहिए ये जिंदगी ये सोच मुझे ..
मत आ दुनिया में ..
संदेश,उपदेश ,सिर्फ ढंग बदले है ..
असलियत भयावह ..
दहेज नहीं स्टेटस चाहिए लड़की का ..
गोरा रंग मानक ..
सावंली मतलब काली ,जैसे गाली दी हों ..
नौकरीशुदा ही हों ..
घर के काम में माहिर, किसी से बात न करे ..
पर व्यवहार कुशल हों..
पढ़ी लिखी होस्टल में किन्तु सीधी हों
धनवान की बेटी हों ..
ख़ूबसूरती भी अभिशाप होगी तुम्हारी ..
ठहरेंगी नजरे पापी तुमपर ..
मत आओ दुनिया में ..जाओ चली जाओ ..
आभी तलक भी ..नहीं बदली ..
शायद कभी न हों पाए अच्छी दुनिया ये ..
सोच वही न बदली है ..
नहीं चाहिए ...दिखती सी आजादी बस ..
मीठे शब्दों के खंजर ..
एक ऐसा नौकर जो सबकुछ सुने और चुप ..
दर्जा बराबर का ही है ..
असलियत तो जीने वाला जाने साथ सदा ..
ईश्वर को कहना --
खुद बन लड़की दुनिया में जी हिम्मत कर ..
तू लौट जा अब भी
मेरी प्यारी राजदुलारी आंसूं मंजूर मुझे मेरे ..
कैसे पियूंगी तेरे आंसूं ..
न कर जिद आने की पछताना न पड़े दोनों को ..
छोड़ दे जिद अब ..
माँ कुलटा नासपीटी कंगले घर की ठीक सही
पर तू क्यूँ बने ..
और लौट जा ....लौट जा ...परदेस वापिस ..
अंग कटेंगे मंजूर ये दर्द ..
ये कुछ वक्त का दर्द न टीसेगा जीवन भर ..

Tuesday, 5 August 2014

तिलिस्म हो जिसे टूटना भी गंवारा नहीं,

 "शब ए हिज्र का जिक्र भी करता है कौन ,
ये अलग बात है हमे इन्तजार बकाया है ||

शब औ गम में हम गुम हुए इसतरह ,
लौट गयी खुशियों का एतबार बकाया है ||

कब छप गयी तस्वीर मालूम न हुआ ,
यूँ हरफ हरफ बांचना हर बार बकाया है ||

तिलिस्म हो जिसे टूटना भी गंवारा नहीं,
सच की छाती पे झूठा इनकार बकाया है ||

जिन्दा हूँ जलकर भी कही अँधेरे में ,
रौशनी के बाद भी अन्धकार बकाया है || "--- विजयलक्ष्मी 

" सच के विज्ञापन में लिखा वो नंगों का हमाम था "

" तहजीब आई नहीं जमीर कोडियों के भाव का 
न मुकद्दर के सिकन्दर थे क्या करते ईमान का 

सफर चलते हुए वो तलाशते चले थे जेहनियत
बेतरतीब ठौर देख ठहरे गोया किस्सा तमाम था

किताबी पढ़ाई तो हमने पढ़ी थी नहीं गौर से 
जिन्दगी को सीखने की हिम्मत होना हराम था 

किस्सागोई होती तो सुनाते लज्जत लपेटकर
पुरखो के खेत में ही तो बस कांटे बोना तमाम था

संसद में जितने बैठे, थे नमाजी या पुजारी सब
सच के विज्ञापन में लिखा वो नंगों का हमाम था
"--- विजयलक्ष्मी