Monday, 16 September 2013

अर्थ की अर्थी निकाली यही वक्ती दस्तूर है

....Hot & cool vs bahan ji ...

दिखावा आधुनिकता का बना दस्तूर है ,
ये सच की दुनिया से ले गया बहुत दूर है 
कल्पना की बातें कल्पना हुयी जिन्दगी 
अर्थ की अर्थी निकाली यही वक्ती दस्तूर है.- विजयलक्ष्मी

नाम ए जाम पीकर मस्त जब दीवाने हो

दर्द जब हद से गुजर जाये जिन्दगी 
दीवानगी की तल्खी जिन्दगी में उतर जाये 
और मरने की तमन्ना मौत के सर पर संवर जाए 
क्या वफा ओ उम्मीदे की चाहना लूटना है जहां तो लुट जाये 
जरूरत खत्म हो जाये पाने की आब को 
न रहे बाकि बानगी कोई पूरा करे जो ख्वाब को 
कोई हद जब आड़े नहीं आती 
रूह में उतर जिन्दगी फना हो जाती 
बहार मजबूर हो जाये उतरने को मेरी गली 
बता क्या जरूरत खौफ की या रूह जब मतवाली हो चली 
बेख़ौफ़ चेहरों चमन खिल उठे खुदाई का
तोड़ने को बंधन कुरआन न फतवा रहे
जिन्दगी की बानगी बता अब बाकी क्या रहे
मिटने की कसमे और रस्मे जब रवानी ले चुके
हूर क्या जानेगी जालिम लुटने का मजा क्या है
देश दुल्हन जिनकी खातिर बाकी कोई जफा क्या है
मिटने उतरे मैदाने जंग तो फिर जिन्दगी की आरजू क्या है
वक्त को चलाने दो खंजर ..पीठ क्या जख्म सीने पे क्या है
हर हिजाब टूट कर गिरे और जमीर क्या मर जिन्दा ही क्या है
नाम ए जाम पीकर मस्त जब दीवाने हो
मौत का फिर खौफ क्या है .- विजयलक्ष्मी

हिंदी दिवस



3.

" क्या झूठ के मुलम्मे इंसान की औकात बदल सकते हैं ... फिर हिंदी से नफरत क्यूँ ?
हिंदी एक दिन की मेहमान क्यूँ 
हिंदी पर एक दिन का अहसान क्यूँ 
हिंदी के माथे सजे स्वाभिमान की बिंदी 
हमारी जिव्हा सजेगी रहेगी दीर्घ काल तक जिन्दी 
मानसपटल पर संवारना होगा हमे
चिरायु हो उचारना होगा हमे ..
मेरी मात्रभाषा हैं ,सोचने विचारने की भाषा है
मुझे इससे ..इसे मुझसे ढेर सी आशा हैं
हिंदी ..माँ बहन बेटी मेरी अमूल्य थाती है
..भारतीय हूँ मैं ..अहसास दिलाती है
बनकर स्वर जब कलम से उतर जाती है
जिन्दा हूँ कही खुद में अहसास दिलाती है
!"
 -------- विजयलक्ष्मी


2.

हिंदी को अपमानित कौन कर रहा है 
हिंदी का शोषण कर अपना पोषण कौन कर रहा है 
हिंदी को किसी की नौकरानी कौन बना रहा है 
हिंदी को नीचा कौन दिखा रहा हैं 
हिंदी के साथ रहने में कौन लज्जित महसूस कर रहा है 
हिन्दी की जिन्दगी को कम करके उसे एक दिन का मुहताज किसने किया
कौन है जो दे रहा है जहर हिंदी को नित्य प्रति
कौन है जो कर रहा है उसे बिन चिता में बैठाये सती
कौन है जिसने बंधक बना डाला उसे उसे उसके ही घर में
कौन है जो देखना तो चाहता है खूबसूरत मगर देता नहीं संवरने
कौन है इन सबका जिम्मेदार ...सजा उसे दीजिये ..
कौन है जिसे हिंदी के साथ पिछड़ने का डर है
कौन है जो बतायेगा कौन सा उसका असली घर है
मैंने सुना है हिंदी बरसों से चैन से सोई नहीं है
ध्यान दे ...क्या आप तो उनमे से कोई नहीं है ?
"
.-------- विजयलक्ष्मी



1.

गर्वित हो खुद से कहो !

हे भाग्य विधाता तुम अहो !
तुम ही जीवन जीवन संगी हो !
कितनी शब्दों की तंगी हो !
तन मन सब सतरंगी हो !
चहु हमारे हिंदी ,हिंदी हिंदी हो !
हिंदी दिवस किसे मुबारक करे
आपको या हिंदी को जिसका आचरण हमने खा लिया और व्याकरण आपने ..
एक दिन मुबारक देनी हो तो न दे ..
खुद में हिंदी बसानी हो तो ...
अवश्य हिंदी की मुबारकबाद हमे भी दे और हिंदी को भी ...
अन्यथा सरकारी दफ्तर की फाइल की तरह ..
आज याद कल खो जाना है
फिर किसे याद आना है ..
दुनिया का मेला है जो आया है उसे जाना है !!.- विजयलक्ष्मी

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं आपको भी और हमे भी ,हमारी हिंदी चिरायु और स्वस्थ रहे इसी आशा और सम्भावना के साथ !!....हम सभी सार्थक हो !- विजयलक्ष्मी 

Sunday, 15 September 2013

काश ,एकबार निहार लेते तुम..
























बिम्बित बिम्ब नयन परिलक्षित डूबे है समन्दर 
कश्ती की दरकार कैसी काश अब उबार लेते तुम !

जर्जर सी नाव अपनी लहरे सुनामी होने लगी है 
इन्तजार इतना था काश,नैया सम्भाल लेते तुम !

फूलों की खुशबू सी महकती, बिखर हमारे दरम्याँ
फूल सा मुझको काश ,सूरज बन निहार लेते तुम !

चपल चपला सा अहसास तड़ित बन गुजरता है 
बन कर गगन मेरा काश खुद से गुजार लेते तुम !

वक्त की चाल कभी मद्धम कभी तुफाँ सी लगती है 
बैठे राह तुम्हारी काश ,एकबार निहार लेते तुम 
 !    विजयलक्ष्मी 

काश,आकर रोक लेते तुम !

जीवन प्रतिपल हुआ समर है ,
वक्त का पहिया भी अग्रसर है 
जीवन गाड़ी चलती जा रही है 
दुखसुख की घड़ियाँ उम्रभर हैं .- विजयलक्ष्मी 





आँख से मोती ढलककर बिखरते रहे इंतजार में ,
पलट पलट कर देखते थे काश,आकर रोक लेते तुम !.- विजयलक्ष्मी