Tuesday, 10 February 2015

" . पूछना तो चाहती हूँ .. " ठीक हो न तुम "

" ठीक हो न तुम "
पूछना चाहती थी 
लेकिन ..
जुबाँ उठती नहीं 
शब्द जैसे ठहर जाये है जिह्वा पर 
आवाज रुंध जाती है ..
और ..
पाते हैं मोहताज सा खुद को
सूख जाती है जुबाँ जैसे सदियों की प्यासी हो
नमी आँखों की छलक उठती है
लेकिन ..
जैसे खो जाने का डर पसर जाता है
मायूस होकर ..
समन्दर की लहरों का आलम देखकर
शब्द नौका समा जाती है उन्ही लहरों में
क्या मालूम ?
कौन जाने जवाब मिले न मिले ?
कशमकश !!
गूंजता रहता है खुद में ही सवाल ..
फिर एक ही जवाब उभरा ..
तेरी सांसे जिन्दगी का सबूत दे रही है न ..बस .
लेकिन ..
चाहकर भी नहीं पूछ पाना
पूछना तो चाहती हूँ .. बार बार तुमसे
" ठीक हो न तुम "| --- विजयलक्ष्मी 

" और बारात लौट गयी "

ममता बिकी
दूध की कीमत में कभी
कभी सुर्ख जोड़े की खातिर टोपी
दहेज ने  मौत को  गले लगाने को किया मजबूर
बिटिया दुल्हन बने कैसे
जेब में नहीं पैसे
और बारात लौट गयी
वो भी चुप था ...
पिता के आगे ,
कहता है बारात मैं ले आया ,,
अब तुम सम्भालो आगे
माँ अरमान हूँ ,,
पिता की शान हूँ
तुम्हारी जान हूँ
....तुम्हारे घरवालो ने कुछ तो जोड़ा होगा
ज्यादा नहीं तो थोडा होगा
प्रेमविवाह को कुछ तो अरेन्ज्ड बनाओ
कुछ नहीं पापा की अंगूठी
मम्मी को चेन ..
पापा को कहो मुझे कार में विदा कराओ
ममता बिकी
दूध की कीमत में कभी
कभी सुर्ख जोड़े की खातिर टोपी
दहेज ने  मौत को  गले लगाने को किया मजबूर
बिटिया दुल्हन बने कैसे
जेब में नहीं पैसे
और बारात लौट गयी  | ---विजयलक्ष्मी

Tuesday, 3 February 2015

" साम्प्रदायिक भ्रष्टाचार का खंजर देशप्रेम की पीठ में दिया धकेल "

पाठ किताबो से गायब  लक्ष्मीबाई की अमर कहानी का ,
पढना किस्सा ज्ञान के पोथो में फिल्मो की महारानी का 
गद्दारों और जबर की तख्ती आज भी टंगी हुई राजधानी में
घोटाले बुर्के जितने लम्बे ,,शर्म मरी डूब चुल्लूभर पानी में
क्या खूब ,,चोरी और ठगी का पैसा धौले रंग में रंग डाला 
नोट वोट के बदले पहले अब बिकते मिले लालपरी महारानी में 
बर्बाद हुआ भविष्य भूत को रौंद डाला चमचो की मनमानी ने 
सच पूछो तो ,कठपुतली क्या देश चलाती गर्त में दिया धकेल
साम्प्रदायिक भ्रष्टाचार का खंजर देशप्रेम की पीठ में दिया धकेल     -- विजयलक्ष्मी 

Monday, 2 February 2015

" चीटियाँ पूर्ण सामाजिक जीव हैं "

तलवार की धार पर धर्म और सत्ता के लालची और पाखंडी हैं ,
सोचती हूँ शीरे में लपेट लाल चीटियों को राह में डालकर भूल जाऊं 
पौधे में पानी की सीचन की तरह ... रोज शीरा डालूँ उनपर 
कुछ नहीं तो चीटियों का भोग लग जायेगा ...
तृप्त जीवात्मा आशीष देगी ... वो भी कुछ समय की भागदौड़ से फुर्सत पाएंगी 
सम्भवतया तुम सत्य से परिचित न हो ...चीटिया पूर्ण सामाजिक प्राणी है ,,
धरती के नीचे इनकी कोलोनिया होती है ,,
सजते है न्यायालय ... लगती है अदालते ..कामचोरी पर भी ,
ये हिंसक नहीं होती किन्तु इनके सिपाही तत्पर रहते है हर इक बदले के लिए
ये इन्सान की तरह दोहरे चरित्र की नहीं होती
इनके विद्यालय में कभी रविवार भी नहीं होता ईद होली दीवाली या ईसा सूली पर नहीं चढ़ाये जाते
यद्यपि चीटियाँ पूर्ण सामाजिक जीव हैं
लम्बी दो कतारे जैसे सडक पर करे एक ही दिशा में दौड़ी जा रही हो
न जाम न धरना ..न मक्कारी न भ्रष्टाचारी न आतंकी लाचारी
यहाँ कोई आक्षेप भी नहीं लगता किसी पर ,,
पुरुष को भी मर्यादा में रहना पड़ता है .
क्यूंकि चीटियाँ वैज्ञानिक तौर पर भी सम्पूर्ण सामाजिक प्राणी है
...और ..........मनुष्य ..? ---- विजयलक्ष्मी

Sunday, 1 February 2015

" ए कवि .. कभी न लिख सकोगे जिसे कहते हो तुम कविता"

ओह ,अकेली ,
नितांत अकेली !
गजब ...कैसे सम्भव है ऐसा हो जाये 
तुम तो औरत हो ..
हर भोर निकलती है जीवन का श्रृंगार किये जानती हो न 
धरती खनक कर ठुमक उठती है
सिंदूरी चुनर ओढ़े ..सूरज से भी पहले ..और तुम ..उससे भी पहले
रात सोचकर सोई थी न इस सुबह के लिए
नींद भी करती है पूरी या नहीं ..
जब तुम्हे सोना चाहिए था खुद को खुद में समेटकर ,,लेकिन ...
प्रात: पेट पूजा की फ़िक्र ..टिफिन कुछ लम्हे rचिड़िया चहक उठी आंगन में.. कौन सी है ?
चिहुक उठा था मन.. झटक दिया वक्त के लम्हों को पकड़ना था उसे तो
चाय ... पानी घर मुह बाए देख रहा है उसे ..मुझे कब सम्भालोगी तुम ,
दोपहर की नाक पहले ही पकती नजर आई और नहीं था कोई लम्हा अपने लिए
पसीने की एक बूँद उभरकर ...लकीर बनती चली कभी कपोल पर और.. टपक !
टीवी में उभरा एक गाना ..कुछ रुनझुन सा .. मन थिरक सकता था लेकिन ..
औरत चारदीवारी के भीतर क्या आजाद है पूरी तरह से
बहराल घर है न उसका ....लेकिन
घर परिवार रिश्ते-नातेदार ..गुनगुना सकती है वो भी मधुर गीत लेकिन ..
आईने के सामने जाकर ठिठकी तो थी इक बार ..
एक लट उलझाकर सुलझा सकती थी अपनी नजरो के सामने ..लेकिन
घर के किसी कोने में वो खुद अकेली नहीं रहती अपने मन से उन्मुक्त
कब उठती है अपनी इच्छा से आँखों को खोलकर ,,
या सो सके कहकर ...नहीं उठेगी वो आज किसी की खातिर
या ..आज होटल बंद है उसका जाओ यहाँ से ..छुट्टी है मुझे भी गुनगुनाना है एक गीत
या फिल्म-अभिनेत्री सा इतराना है जिसकी तारीफे सुनकर तकती रह जाती है खुटकर भी दिनभर ,,
खीज उठता है मन कहने को --
"बुला लो न घर में चकरघिन्नी बनेगी तो आटे-दाल का भाव "
निकल गये कितने पड़ाव उम्र के ...कब बालो में सफेदी चमकने लगी....आज सोचा ..
एक पल को ...कैसी लगती हूँ मैं आज देखूं तो जरा ...लेकिन
सफेदी जैसे मुह चिढ़ा रही थी इस उम्र में ... अब आइना देखने को क्या बचा है ?
थिरके कदम क्या उम्र बची है तुम्हारी अब ?
आँखों के नीचे की लकीरे पीट रही थी दरवाजा बहुत तेजी से ...शायद ,,
कह रही थी अब !!.. उम्र ढुलक गयी मुट्ठी की रेत सी ,,
नजर नीची किये जुट गयी ..उसी तपस्या में ..जिसका परिणाम निर्भरता ही था सदा से
समाज ,परिवार, रिश्ते -नातेदार कोई नहीं आया कहने कभी ...
आओ तुम भी जी सकती हो स्वतंत्र होकर ,,
और पिता की झुकी आँखों का ख्याल ,,माँ का बीमार सा चेहरा ..बंद करता रहा मुझे
क्या कहू किसी को ..मैं एक औरत हूँ ..
जन्म और जीवन मेरे अपने कब थे ..जब मेरे अपने हुए तो ..मैं औरत नहीं लगी किसी को
सजावट और नजर सेंकने का साधन मात्र बनी |
क्या हुआ क्या ये सच नहीं है ...अगर नहीं तो कभी झांक लेना उन लम्हों में ,
जीवनसाथी कही गयी बनी कब ?
हमसफर सुना बहुत बार लेकिन हुआ सफर कब ?
मुझे खामोश ही रहने दो ..
मेरे एकांत में न झांको ए कवि ..
कभी न लिख सकोगे जिसे कहते हो तुम कविता | --- विजयलक्ष्मी