Sunday, 2 March 2014

मौन बोलता नहीं

मौन बोलता नहीं नद सा उछलकर 
मौन लहराता है समन्दर में बदलकर 
मौन बहता है लहू में पिघलकर 
मौन दहकता है सूरज सा जलकर 
मौन बरसता है बादलों से निकलकर 
मौन ठहरा है ,,रात में बात में ..भोर में शोर में ..
जीवन के ठौर में ..
खेत में ..बीज में 
मौन खड़ा है सडक के दोनों और धुप में तप रहा है 
मौन के घर की दीवारे ढह चुकी है 
मौन रहता है आसमान की छत वाले घर में
निहारता है चाँद को चांदनी में बसकर निश्छल सा
बसता है भीतर मेरे और तुम्हारे .." निशब्द सा "
मौन को मौन ही रहने दो ..
चीखेगा एक दिन जब ...मुखर होकर
चीरकर भीतर तक उभरे सन्नाटे से
तब दुनिया दहल उठेगी एक दिन ..देखना तुम भी .- विजयलक्ष्मी

हौसला ही जीवन की पहली और अंतिम सीढी है"

मौसम है कि ...थम ही नहीं रहा
उपर वाले को क्या सूझ रही है 
ठिठुर रहा है खुद भी और साथ अपने दुनिया को भी 
वसंत आकर भी नहीं आएगा क्या 
या 
फाग बरस रहा है 
आकाश की छाती चीरकर 
आखिर क्यूँ ..?
जलवृष्टि भी सुनी जाये 
किन्तु ..
जम गये अहसास गिर रहे है श्वेत रंग में डूबकर
ठिकाना मिलकर भी नहीं मिला शायद ..
ये कैसा अहसास है ...
जो रिसना भूलकर जम गया भीतर ..
टूटकर बिखर रहा है बेसाख्ता बिन मौसम
मगर फूल है
चाहत मुस्कुराने की लिए आंख खोल रहे हैं धीरे धीरे
जीवन की आस ...
एक हौसला ..
जीवन के झूले पर पेंग बढ़ाने का
मुर्दा हुए पलो में रंग भरने का
क्यूंकि ..
हौसला ही जीवन की पहली और अंतिम सीढी है .- विजयलक्ष्मी

Saturday, 1 March 2014

मजमून ए महबूब लिखे तो गजल ,

मजमून ए महबूब लिखे तो गजल ,

गर खुदाई नक्शे पा मिले तो गजल .



गर होश ओ हवास गुम तो गजल


जो अहसासात ए हवा चले तो गजल .



किस्मत का फजल मिले तो गजल 


जो डूबकर भी जिन्दा मिले तो गजल.


शिद्दते दोस्ती हरूफ निभाए तो गजल


गर कलम ईमान से मिले तो गजल .



वाइज की न पूछ गर चले तो गजल


अजब हकीकत ये हम खिले तो गजल.- विजयलक्ष्मी

"तुम्हारी करनी और कथनी के अंतर को जनता बार बार क्यूँ भरे ?"

राजनैतिक पार्टियां जरा ध्यान दे ..
जोश को होश भी लेने दो जरा ... होश आया तो दिमाग चलेगा ...दिमाग चला तो ...क्या होगा ....सोचना नहीं करके दिखाना होगा ...
...राजनैतिक हल्के का शोर ..करोड़ो का खर्च !!
कौन कितने पैसे लेकर राजनीती में आया ..कितना खर्च कर रहा है ...किसने दिए .. उससे भी बड़ा सवाल ..अगर आम आदमी के पास इतने पैसे है तो आम कैसे हुआ ..? क्या एक रिक्शे वाले की जेब के चालीस रूपये चालीस हजार बन गये खर्च करते हुए ...लोगो की भावनाओं को इस तरह न भुनाओ ...भडक गयी तो जलाकर ख़ाक में मिला देगी .....सवाल करना अच्छा है लेकिन सवाल वही उठाओ जिनका उत्तर खुद के पास भी हो ...दिल्ली को छोडकर भागने वाले अगर देश को भी मझधार में ही छोड़ कर भाग गये तो क्या ......दुबारा लोक सभा चुनाव होगा .....इस खर्च को कौन सी पार्टी वहन करेगी ये भी तय कर लिया जाये तो अच्छा है ......
"" तुम्हारी करनी और कथनी के अंतर को जनता बार बार क्यूँ भरे ?""-- एक नागरिक विजयलक्ष्मी

"ए वाइज तू सुनाता बहुत है कभी खुद भी तो सुन ,"

वाइज़ =धर्मोपदेशक
पीर-ए-मुगाँ= शराब बेचने वाला
तबस्सुम = मुस्कुराहट
तग़ाफ़ुल=ग़फ़लत, बेरुख़ी
रिन्द= शराब पीने वाला
रूदाद =दशा, वृतान्त
हामिल= भार ढ़ोने वाला
दश्त -नवर्दी= जंगलों में फिरना ,wanderer
मरगूब =जिसकी तरफ रगबत हो, रूचि

ए वाइज तू सुनाता बहुत है कभी खुद भी तो सुन ,
पीर ए मुगाँ लिए तबस्सुम ए लब रिन्द रहा है बुन.

रुदाद ए मरगूब ए वफा की खातिर ही जिन्दा रहे
तगाफुल ए मुहब्बत ए रुदाद ए किस्सा तू भी बुन.

मैं हामिल ए रुदाद ए बेवफाई हूँ समझ जायेगा
दश्त-नवर्दी हूँ मरगूब ए मुहब्बत ए रुबाई रहा हूँ बुन 


तबस्सुम ए लब लबालब रिन्द बनाया बा-नजर 
बेख़ौफ़ जी जिन्दगी किये नफरत से तौबा ए तगाफुल  - विजयलक्ष्मी