Monday, 7 October 2013

ईंटें ..


ईंटो के मकाँ ..ईंटों के हथियार ,
ईंटों की मजार ,ईंटो बाकी रहेगी दरकार .
ईंटो का व्यापार ,ईंटों से बाजार 
ईंटो की करनी को भुगतेगा सारा ही संसार .

- विजयलक्ष्मी 







नीव में भी ईंट है ......कंगूरे भी इंट के ,


घर उजड़ते भी ईंट से.. घर बनते ईटं से 


,
भ्रान्ति में फिंकती है ईंटे क्रांति भी करती है ईंटे 



कुछ काम बांतों से नहीं ,,,बनते हैं ईंट से .

-- विजयलक्ष्मी

"माँ "तुम दिखती नहीं बसी हो मुझमे ही कहीं .

"माँ "तुम दिखती नहीं बसी हो मुझमे ही कहीं ..
आवाज घुमड़ कर मुझमे ,मुझमे ही समा जाती है ,
तुम साथ हो मेरे ये अहसास दिला जाती है 
मेरी रगों में दौड़ता है जो लहू तुम्हरी दी हुयी वो चेतना है 
और बेचैनी है नजरों में तुम्हे न ढूंढ पाने की 
स्वप्न जी तुमने दिए थे आँख में को मेरी समेटे है मैंने 
बहती नदी जो वक्त की उसमे यादे है तुम्हारी 
और एक बंद मुट्ठी जिसमे चंद लकीरे उकेर डाली वक्त ने 
जीते है आज भी उन्ही लम्हों में तुम्हारा हाथ थामकर
सफर जो करना चाह तुम्हारे साथ मगर तुम चल दिए
उसी अहसास में चल रहे है इस डगर ..
और स्नेह तुम्हारा बांधकर रख लिया साथ अपने
नहा लेते है और आचमन भी उसी से ...मुझमे बहते हो सदा
आंगन छूटा अपना दर छूटा सखियाँ छूटी ...
नहीं छूता तो तुम्हारे साथ का अहसास जो जिन्दा है वर्षों बाद भी मुझमे
डगर इम्तेहान की तुम दिखा गये जो चल रहे हैं
श्रद्धा है श्राद्ध का हक मुझे मिला नहीं ..
पुकारना चाहते हैं बार बार ..कोई दर खुला मिला नहीं
और खुद में बसा कर घूम रहे है अब हर डगर
तुम्हारा प्यार देता है अवलम्बन हर टूटते पल में मुझे
दुनिया से शिकायत क्या करे
चले आयेंगे फिर तुम्हारे पास तुम ठहरो जरा
मुझे जिन्दगी के लम्हों का करना है हिसाब ..
आहत आहटों का लिखना है हिसाब ..तुम ठहरो जरा
और फिर चले आएंगे..दूर इस दुनिया से ...चैन से सोने .- विजयलक्ष्मी 

पाकीजा से मोती

ये जो उतर आते हैं पलको में दुआ बनकर छलकते है ,
पाकीजा से मोती ,अहसास के समन्दर से निकलते हैं
रंग श्वेत जिनका आभा रक्तिम सी पिरोये स्नेह धागे में 
छलकती है पाकीजगी जिनसे दामन में मेरे चमकते हैं 
चाँद कह दूं सूरज कहूं या ईमान का आना ईमान पर है 
जुगनू सा चमक लहरता जैसे पहाड़ी झरने छलकते हैं .- विजयलक्ष्मी 

तुम तो नहीं ...

वो सांकल खनकती है हवा से जब दर की मेरे ,
एक अहसास चला आता है ख्वाब सा तुम तो नहीं 

एक स्मित सी उभर आती है होठो पर खुद ब खुद 
जी सकेंगे इस ख्वाब को कहकर क्या तुम तो नहीं

कल उलझ गया था आंचल यूँही उड़कर गुलाब से 
महकाता है मुझे लिए शुलों सी चुभन तुम तो नहीं 

टीस सी उठती है घुलकर हवाओं में मुझे संवारती है 
लिए संग यादों के मेले घुमती हूँ जिसे तुम तो नहीं

ओढ़ी थी चुनरी वो चटक से रंग की , भायी दिल को
उठता है ख्याल दिल में उसे लाये कहीं तुम तो नहीं.- विजयलक्ष्मी 

Sunday, 6 October 2013

वक्त को पकड़ने की चाहत ने जगा दिया ख्वाब से पहले



वक्त को पकड़ने की चाहत ने जगा दिया ख्वाब से पहले
और सूरज का इंतजार हुआ चाहता है जाग जागकर यहाँ
बात कल की वक्त से पिछड़ कर खामोश से बीतते दिवस को देखा किये अकेला बैठकर
और जिन्दगी को जाते हुए देखा था खुद को लपेटकर
भोर का सूरज निकलकर पूछेगा नैनो से ख्वाब खोये क्यूँ 

ये बता जब साथ था नूर मेरा फिर तुम रोये क्यूँ
कैसे कहूं हर लम्हा उजाले का भी तुम बिन लगे है घनेरी रात सी
और जब मुस्कुरादो तुम नजर में बैठकर रात गहरी भी खिले उगते हुए जज्बात सी
आओ सूरज का स्वागत करें मुस्कुराकर झूमते गगन और खिलते फूल है धरा पर
भोर चिड़ियों को बुला रही है स्वागत गीत गाने के लिए
भावना लिए सौम्य से स्नेह सज्जित स्वप्न सच बनाने के लिए
और अम्बर शर्म से सिंदूरी सा हुआ मिलन के अहसास से
नदी स्नेह की बह उठी ,, खेलती है लहरे प्रथम किरण के सलौने अहसास से
मंत्रोच्चार के साथ घंटी बज रही है मन्दिर में जैसे
अनुपन छटा सी उतरेगी अंगना में मेरे मुस्कुराता है तुलसी का पौधा
.- विजयलक्ष्मी