Thursday, 3 October 2013

मेरे हौसले हैं बहुत बड़े बंदूक लिए रहो खड़े



मेरे हौसले हैं बहुत बड़े बंदूक लिए रहो खड़े 

ये टुकड़ा नहीं है सबक है तुम्हारे लिए 


मरने से नहीं डरता ..मारता हूँ जिन्दगी के लिए 


जिन्दा रहने की ख्वाहिश है फिरता हूँ आग दिल में लिए 


मेरी उम्र पर न जाना ..छूटा नहीं है अंदाज पुराना 

देखना तो देख जिन्दा हूँ जिन्दगी का हुनर हूँ लिए 


उस दिन ..तक ..


तुम्हे सबक सिखा दूंगा ..जिन्दगी को जीने का बुलंद हौसला दिखा दूंगा 


यही सबक आने वाली पीढ़ियों को सिखा दूंगा 


भूख और वजूद के लिए आग सब दिलों में लगा दूंगा 


उस दिन ...तक ..


जिन्दा हूँ और जिन्दा ही रहूँगा ..


याद रखना मैं ..मरके भी नहीं मरूंगा ..


मरने का सबक सिखा चुका हूँ जिन्दगी के लिए 


मेरे हौसले हैं बहुत बड़े बंदूक लिए रहो खड़े 


ये टुकड़ा नहीं है सबक है तुम्हारे लिए 


मरने से नहीं डरता ..मारता हूँ जिन्दगी के लिए.- विजयलक्ष्मी 

इन्तजार ए शम्स है अभी गहरी रात दिखती है



रंग ए गुलशन जब भरे तो ये बहार दिखती है ,


रंग ए वतन पे मेहरबाँ तो ये तलवार दिखती है 


तुलिका या कलम है,ये क्यूँ बेजार दिखती है ,


देश की खातिर ही सबकुछ निसार लिखती है 


ढीठ है ये नेता, निकम्मी ये सरकार दिखती है 


एक उम्र बीत गयी रफ्तार से बेकार दिखती है 


हद ए इंतजारी में नादानियाँ इंतजार लिखती हैं 


सियासी चाल रियासती दिखावा बेकार लिखती है 


न्याय की चौखट सबको नहीं गुनहगार लिखती है


दुश्मन से मिलाते हाथ भाई को खंजर दिखती है 


सी बी आई भी अब करोड़ो को हजार लिखती है 


गुनहगार कोई खास क्लीनचिट इन्तजार करती है 


देश की माली हालत पतली तबियत बेजार दिखती है


नीमहकीम खतरा ए जान सत्य से बेजार दिखती है


इन्तजार ए शम्स है अभी गहरी रात दिखती है.- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 2 October 2013

किश्तों में ...

हमे इंतजार मौत का,उन्हें लुत्फ़ किश्तों में ,
इंसान ढूँढा किये ,गिनती उनकी फरिश्तो में 

रूह से मुलाकात रूबरू हुए तस्वीर दीवारों में 
महाजनी पक्की है मूल मिलता है किश्तों में

इन्तजार किया बरसों दौर ए अँधेरे बीतते है 
कराते है मगर.. दीदार भी हमे तो किश्तों में 

तस्वीर देख, नजर भी चस्पा गयी तस्वीर पे
करते है दीदार ए तसव्वुर भी अब किश्तों में

बरसों बरस बीते रंग ए मुहब्बत के ख्वाब में
नजरे इनायत हुयी जब से जिन्दा है किश्तों में .- विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 1 October 2013

बहुत बेताब हुआ है दिल



बहुत बेताब हुआ है दिल नजर भर देख लू 

जिन्दगी कह उठी तुम मिलो तो संवर जाऊं

इंतजार ए हद कोई तो हो तुम्हारी भी कभी 


कहने लगा है मन अब जिद पर उतर आऊँ

रात गहरा रही है और अँधेरा चस्पा है दरो पे 


क्यूँ न राह पर तेरी शमा बनकर बिखर जाऊं

आओ कुछ ख्वाब अपने पलकों पर उतार ले 


ख्वाब ये ख्वाब सा तेरी पलकों में संवर जाऊं

पुकार लो मुझे कुछ इस तरह.. होठ न हिले 


सुनकर आवाज तुम्हारी जहां हूँ बिखर जाऊं .- विजयलक्ष्मी

दूर वृक्ष पर फल लगे देख समझ अब पेट भर जाये

समाज ..जिनके मन अधूरे खुद में उन्हें पूरा होने की आस,
कुछ घूमते है प्यासे जिन्हें जन्मों की प्यास. 
कुछ बेगैरत से जिन्हें लज्जा छूती भी नहीं 
कुछ यहाँ कैद है इज्जत के मारे 
कुछ गाते है उल्फत के तराने वीररस की चाशनी पागकर
कुछ मजनू हुए कुछ चेला गलियों के 
कोई सूरज मिल जाता ..मिट जाती जन्मों की प्यास ..
दीप जलाकर रखा परकोटे तपिश मिले तप जाये,
दूर वृक्ष पर फल लगे देख समझ अब पेट भर जाये .- विजयलक्ष्मी